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कोई हार के बाद तो कोई जीत के बाद....कोशिश, बस अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की 18-10-51

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बदायूं। राजनीति में वैचारिक, सैद्घांतिक मनभेद और मतभेद खास मायने नहीं रखते। पूर्व सांसद धर्मेंद्र यादव द्वारा मौजूदा सांसद डॉ. संघमित्रा मौर्य के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में दायर रिट को वापस लेने के मामले का भी राजनीतिक गलियारों में यही मतलब निकाला जा रहा है। माना जा रहा है कि पूर्व सांसद आजमगढ़ उपचुनाव में हार के बाद बदायूं में अपनी राजनैतिक जमीन बचाने की तैयारी कर रहे हैं तो जीत के बाद भी भाजपा में अलग-थलग मौजूदा सांसद भी अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की कोशिश में हैं। फिलहाल, लोकसभा चुनाव में दो साल का समय है और ‘पिक्चर अभी बाकी’ है।
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साल 2014 के चुनाव में जब पूरे देश में मोदी लहर चली थी तब भी सपा से धर्मेंद्र यादव जीत हासिल करते हुए बदायूं के सांसद चुने गए थे। दूसरी बार सांसद बने धर्मेंद्र को जनता ने उनके द्वारा कराए गए विकास कार्यों के कारण हाथों-हाथ लिया था पर 2019 के चुनाव में धर्मेंद्र को भाजपा की डॉ. संघमित्रा मौर्य ने शिकस्त दे दी। हालांकि जातिगत आंकड़ों के आधार पर धर्मेंद्र की हैट्रिक लगाने का अंदाजा लगाया जा रहा था लेकिन उस पर पानी फिर गया। धर्मेंद्र यादव ने उस समय मतगणना में धांधली का आरोप लगाते हुए साफ कहा था कि उन्हें बेईमानी से हराया गया था। उन्होंने हाईकोर्ट में रिट दायर कर दी थी, लेकिन तीन साल बाद अचानक रिट वापस लेने के फैसले ने सभी को चौंका दिया है।
तो क्या अलग करवट लेगी बदायूं की राजनीति
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि दरअसल मौजूदा सांसद संघमित्रा मौर्य को भी अपने राजनीतिक भविष्य पर खतरा दिखाई दे रहा है। भाजपा के स्थानीय नेताओं से उनकी पटरी नहीं खा रही है तो उनके पिता सपा में शामिल हो गए हैं। उनके द्वारा विधानसभा चुनाव में खुलकर किया गया भाजपा का विरोध भी उनके खिलाफ ही जा रहा है, ऐसे में हो सकता है कि भविष्य में वह भी पिता की राह पर चलते हुए सपा में संभावनाएं तलाश रही हों। लोग इसे धर्मेंद्र यादव द्वारा रिट वापस लेने के फैसले से ही जोड़कर देख रहे हैं। हालांकि संघमित्रा लगातार खुद को भाजपा का सच्चा सिपाही बता रही हैं लेकिन यदि भविष्य में ऐसा होता है तो सपा की राजनीति अलग ही करवट ले लेगी।
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इधर, यह भी माना जा रहा है कि आजमगढ़ से उपचुनाव हारे धर्मेंद्र को भी बदायूं में अपनी सियासी जमीन बचाकर रखनी है। धर्मेंद्र भी लगातार यही कहते आ रहे हैं कि बदायूं से उनका नाता कभी नहीं टूटेगा। ऐसे में यदि भविष्य में कभी संघमित्रा पाला बदलती हैं तो वही कहावत सही हो जाएगी कि राजनीति में कभी कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता।
बदायूं में भी भाजपा से अलग-थलग दिखती हैं सांसद
चुनाव जीतने के बाद संघमित्रा मौर्य कुछ समय तक तो समय-समय पर बदायूं की जनता के संपर्क में रहीं, साथ ही पार्टी कार्यक्रमों में भाग लेने का भी सिलसिला चला, लेकिन धीरे-धीरे उनका यहां आना कम होता गया। महीने-दो महीने में यहां आकर गिने चुने पार्टी कार्यकर्ताओं से बात और एक दो कार्यक्रमों में शामिल होना ही औपचारिकता रह गई। पिछले विधानसभा चुनाव से पहले जब उनके पिता स्वामी प्रसाद मौर्य भाजपा छोड़कर सपा में शामिल हुए, तभी से कयास लगाया जाने लगा था कि अब संघमित्रा भी सपा में जा सकती हैं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हालांकि अब भी वह पार्टी के कार्यक्रमों में यदाकदा ही दिखाई देती हैं।
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