इस अवसर पर संत ने रामायण का प्रसंग सुनाया जिसमें माता जानकी के चरण में जयंत ने अपनी चोंच से प्रहार किया था। उन्होंने कहा कि भगवान राम ने एक तिनके का तीर बनाकर जयंत को निशाना बनाया, लेकिन वह तीर जयंत के पीछे ही रहा। जयंत शरण लेने के लिए विभिन्न स्थानों पर गया। मगर किसी ने उसकी रक्षा नहीं की। अंत में वह नारद मुनि के कहने पर उसे भगवान राम की शरण में जाना पड़ा। भगवान राम ने उसे एक नेत्र का करके क्षमा कर दिया। अतएव भगवान अपनी शरण में आए हुए प्राणि की सदैव रक्षा करते हैं। भगवान पर यह प्रण है कि मैं अपने शरणागत की रक्षा करता हूं। इस मौके पर सुभाष आहुजा, कवि कुलदीप अंगार, अशोक नांरग, मदन लाल, अशोक राय, श्रीनिवास राजपूत, नरेंद्र गरल, डा.राजाबाबू वार्ष्णेय, नीरज माहेश्वरी, मनोज, सुवीन माहेश्वरी, संजीव, दिनेश चंद्र मौजूद रहे।