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Budaun News: बच्चों को भूसे की तरह भरकर दौड़ रहे स्कूली वाहन

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स्कूल संचालकों को नहीं है कार्रवाई का कोई खौफ
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संवाद न्यूज एजेंसी
बदायूं। स्कूली वाहनों में बच्चों को ले जाने के लिए जिले कई स्कूली बसों को लगाया गया है। इनमें से अधिकांश बसें मानक को दरकिनार करके बच्चों को ढो रही हैं। बच्चों को ले जाने के लिए टेंपो, ई-रिक्शा व रिक्शा समेत अन्य साधन भी लगाए गए हैं, जिसमें बच्चों को भूसे की तरह ठूंसा जा रहा है। बच्चों की सुरक्षा को लेकर सरकार गंभीर हो गई है। शासन ने बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी भी दी है। लेकिन इसके बावजूद यहां बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़ हो रहा है।
जिले में कहीं भी बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके, इसके लिए अभिभावक नामी गिरामी स्कूलों के चक्कर काट रहे हैं। चाहे स्कूल घर से पांच से दस किलोमीटर दूर ही क्यों न हो। स्कूल भी बच्चों को घर से स्कूल तक लाने व पहुंचाने के एवज में मोटी फीस वसूलते हैं। अधिकांश बड़े निजी स्कूलों ने तो बसों तक की व्यवस्था कर रखी है, लेकिन कई स्कूल परिवहन व्यवस्था में फिसड्डी हैं। ऐसे मेें बच्चों को ऑटो, विक्रम, कार और मैजिक से ढोया जा रहे हैं। ऐसे वाहन स्वामियों को बच्चों के सुरक्षा की कोई फिक्र नहीं है। क्योंकि इनमें अधिकांश आटो और मैजिक चालक न सिर्फ नियम विपरीत वाहन चलाते हैं। हालात ये है कि जिले में करीब पौने तीन सौ स्कूली वाहन है। जिनमें करीब ड़ेढ़ सौ बसें और बाकी छोटे वाहन है। एआरटीओ के अनुसार साल में एक बार स्कूली वाहन की फिटनेस देखी जाती है। उस दौरान मानक पूरे होने के बाद भी उनको फिटनेस प्रमाण पत्र दिया जाता है, क्योंकि उनके फोटो खिंचकर विभाग की बेवसाइट पर अपलोड करने होते हैं। ऐसे में स्कूल संचालक को मानक पूरे ही करने होते हैं।
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फिटनेस प्रमाण के लिए इन चीजों को होती है जरूरत
विभागीय अधिकारियों के मुताबिक स्कूली वाहन की फिटनेस के दौरान फास्ट एंड बॉक्स, फायर सिलिंडर, सीसीटीवी कैमरा, पीला रंग, स्कूल का नाम वाहन के दोनों ओर, ड्राइवर का नाम और नंबर, शीशों पर लोहे की रॉड बाहर की तरफ लगी होनी चाहिए। साथ ही जितनी सीटर बस है। उनते ही बच्चे को बैठाया जाए।

ये होता है खेल
स्कूल संचालकों के पास कई वाहन होते हैं, लगभग सभी वाहनों को फिटनेस प्रमाण पत्र अलग-अलग तिथियों पर होता है। ऐसे में जब जो वाहन फिटनेस कराने के लिए एआरटीओ कार्यालय पहुंचता है। उससे पहले स्कूल वाले उस वाहन के सभी मानकों को पूरा कर देते हैं। प्रमाण पत्र मिलने के बाद अधिकांश चीजें दूसरे वाहन के लिए रख दी जाती है।

अभिभावकों ने कहा
स्कूल वाहन में बच्चों को भेजने से केवल एक ही फायदा है। जब पढ़ाई के बाद छुट्टी होगी तो बच्चा स्कूल बस में परिसर के अंदर से बैठकर सड़क पर आता है। इसके अलावा स्कूली वाहन में क्या सुविधाएं दी जाती है। इसके बारे में जानकारी नहीं है।
-आदिती सूरी

स्कूल की तरफ से हर माह के लिए स्कूली वाहन का फीस निर्धारित है। वह समय पर आता, साथ ही छोड़कर जाता है। स्कूली वाहन में फास्ट एंड बॉक्स नहीं था। इसको लेकर शिकायत की थी। बाद में उसे वाहन में रखवा दिया गया था।
-रीना शर्मा

जब तक बच्चे स्कूल से घर पर नहीं आ जाते हैं, तब तक चिंता बनी रहती है। क्योंकि स्कूल वाहनों को लेकर कई बार हादसे होते रहे हैं। इससे हर अभिभावक के मन में डर बना रहा है। अगर वाहन 10 मिनट भी देरी से आए तो बैचेनी बढ़ जाती है।
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-रेखा

अधिकांश स्कूली वाहनों में बच्चों को सीट के सापेक्ष नहीं बैठाया जाता है। कई-कई वाहन में बच्चों को खड़े होकर आना पड़ता था। ऐसे में प्राइवेट वाहन से बच्चें को स्कूल भेज रहे हैं।
-ज्ञान देवी
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