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पुलिस का कारनामा, मनमर्जी की फर्द और पंचनामा

Fri, 20 May 2016 11:19 PM IST
बदायूं, ब्यूरो
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थाने में बैठकर पूरी कर दी जाती है कागजी कार्रवाई
हत्या जैसी संगीन वारदात में भी मौके पर फर्द नहीं
 पुलिस पर कानून व्यवस्था बनाए रखने का दारोमदार होता है। सभी लोग कानून के  दायरे में रहकर काम करें, यह जिम्मा भी पुलिस का है। कानून तोड़ने वालों को पुलिस कोर्ट के जरिए सजा दिलाती है। पुलिस एक्ट में पुलिस के लिए भी कुछ नियम और कायदे निर्धारित हैं। इनमें एक काम यह भी है कि कोई घटना होने पर संबंधित थाना पुलिस को मौके पर पहुंच कर फर्द और पंचनामा भरना चाहिए। मौके से बरामद सभी सामान का जिक्र गवाहों के बयानों के साथ फर्द में होना चाहिए। कोई शव मिलने पर मौके पर ही पांच लोगों से पड़ताल के बाद पंचनामा भरा जाना  चाहिए, लेकिन पुलिस ऐसा नहीं करती। नियमों को दरकिनार कर फर्द और पंचनामा थाने और अस्पताल में बैठकर भर दिया जाता है। इसका लाभ कोर्ट में आरोपियों  को मिलता है।
पुलिस एक्ट में निर्धारित है कि कोई आपराधिक वारदात होने  पर फर्द मौके पर दर्ज की जाएगी। मौके से बरामद सभी सामान की लिखा-पढ़ी की जाएगी। अगर कोई हत्या होती है, तो मौके पर ही पंचनामा भी भरा जाएगा। ज्यादातर मामलों में फर्द और पंचनामा की कार्रवाई मौके पर नहीं होती। फौजदारी के वरिष्ठ अधिवक्ता भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि मौके पर फर्द और पंचनामा न होने की वजह से इसमें तमाम तथ्य गलत दर्ज हो जाते हैं। इसका फायदा बाद में आरोपी को मिलता है। 
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कुछ ताजा संगीन वारदात पर गौर करें तो पुलिस का रवैया साफ हो जाता है। जरीफनगर के गांव नैनोल बागवाला में मंगलवार रात बुजुर्ग सगीर की हत्या कर दी गई थी। पुलिस ने मौके पर न तो  फर्द दर्ज की और न ही पंचनामा भरा। इसी तरह कुंवरगांव के चकोलर गांव में नन्हें नाम के मजदूर की हत्या कर शव फेंका गया था। इस मामले में थाने में बैठ कर ही लिखा-पढ़ी की कार्रवाई पूरी कर दी गई। पिछले सप्ताह इस्लामनगर  में सड़क हादसे में चार लोगों की मौत का मामला हो या फिर दातागंज तिराहे पर हादसे में दो लोगों की मौत, पुलिस ने मौके पर फर्द और पंचनामा भरने की  कार्रवाई नहीं की। कथित तौर पर इन मामलों में थाने में बैठकर ही लिखा-पढ़ी कर दी गई। ज्यादातर मामलों में पुलिस का यही रवैया रहता है।
जीडी और एफआईआर में नहीं बदलता वक्त
बदायूं।  किसी भी मामले में एफआईआर दर्ज करने से पहले संबंधित थाने का अफसर पूरा  मामला जीडी (जनरल डायरी) में दर्ज करता है। इस पर वक्त भी लिखा जाता है। जीडी में मामला दर्ज होने के बाद एफआईआर दर्ज होती है। संबंधित थाने के  मुंशी को एफआईआर दर्ज करने में भी कुछ वक्त लगता है। इसके बावजूद जीडी और एफआईआर में वक्त नहीं बदलता। इसका लाभ भी आ रोपियों को मिलता है।
अक्सर गलत हो जाती है पुलिस की फर्द
बदायूं।  नियम के मुताबिक फर्द मौके पर दर्ज होनी चाहिए। घटनास्थल के बरामद सभी  सामान के साथ इसमें वहां मौजूद लोगों के बयान भी दर्ज होने चाहिए। घटना से  संबंधित फर्द थाने में भरी जाने की वजह से इसमें गलत सूचनाएं दर्ज हो जाती  हैं। कई बार तो घटनास्थल तक बदल जाता है। ट्रायल के दौरान आरोपी को पुलिस  की इस मनमानी का लाभ मिलता है। 
पीड़ित को नहीं दी जाती फर्द की नकल
बदायूं। नियमानुसार फर्द की एक नकल पीड़ित को दी जानी चाहिए। ज्यादातर मामलों में फर्द की नकल मौके पर पीड़ित को नहीं दी जाती। मामले का विवेचक केस डायरी में दर्ज कर देता है कि फर्द की नकल पीड़ित को दी गई। कोर्ट में जिरह के  दौरान वादी पक्ष से वकील सवाल करता है कि क्या फर्द और पंचनामा की कार्रवाई मौके पर की गई। इससे पीड़ित इंकार कर देता है। इसका लाभ आरोपी को मिलता  है।
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पुलिस एक्ट के मुताबिक फर्द और पंचनामा की  कार्रवाई मौके पर की जानी चाहिए। पुलिस ऐसा नहीं कर रही। वादी को फर्द की  नकल भी नहीं दी जाती। फर्द में जानकारियां गलत होने का फायदा आरोपी को  मिलता है। फौजदारी के मामलों में मैं लंबे समय से पुलिस की यह मनमानी देख रहा हूं।
-मोहम्मद उमर सहसवानी, वरिष्ठ अधिवक्ता फौजदारी
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