सिपाही गौरव टाइटलर द्वारा छत से फेंके जाने के बाद घायल बिटिया
ने सच सामने लाने की हिम्मत न जुटाई होती तो उसके दोनों चाचा जेल की
सलाखों के पीछे होते।
सिपाही की करतूत छिपी रहती और पुलिस भी मामले को
दबाने में कामयाब हो जाती। पैरोकारों के जरिए पुलिस को जब यह पता लगा कि
पति की नौकरी और पेंशन के लिए बिटिया की मां का उसकी सौतन से विवाद है तो
सौतन के मददगार देवरों को नामजद करा दिया गया।
यह सच्चाई पुलिस अफसरों
को भी पता है। चूंकि सच भी सामने आ चुका है तो बिटिया की मां का कथित करीबी
खुद को शर्मिंदा महसूस कर रहा है। बिटिया के पापा यहां एक कॉलेज में टीचर
थे। उनकी दो शादियां हुईं। पहली पत्नी से तलाक का मामला कोर्ट में भी गया।
बिटिया के पापा ने अपनी मौजूदगी में ही उसकी मां को जीपीएफ का हकदार बना
दिया लेकिन पेंशन पर विवाद रहा। पहली पत्नी ने शिकायत दर्ज कराके जीपीएफ की
रकम के भुगतान में अड़ंगा डाल दिया था। इसमें उसे दोनों देवरों का सहयोग
मिला था।
थाना स्थित कमरे की छत से सिपाही द्वारा छात्रा को फेंके जाने
के बाद पैरोकारों के जरिए पुलिस को जब यह पता लगा, तो आनन-फानन में ऐसी चाल
चली, जो उस वक्त आरोपी को बचाने में मुफीद साबित हो रही थी। देवरों की
नामजदगी भी यही कहकर करा दी गई कि बिटिया की मां की सौतन को कुछ हासिल नहीं
होगा। साथ ही उसके मददगार दोनों देवर भी जेल चले जाएंगे लेकिन बिटिया के
बेखौफ हौसले ने सच सामने ला दिया।
मौसा-मौसी बने बिटिया का आइना
उझानी।
सूत्रों की मानें तो नामजद दोनों चाचा बिटिया की मौसी और मौसा के संपर्क
में पहुंचे। उनके संज्ञान में दोनों अपनी बेगुनाही का सबूत भी लाए। बात
बिटिया के कान तक पहुंची तो उसने सच बयान कर दिया। बिटिया की जुबां से सच
सुनने के बाद ही घरवालों के साथ उसकी मां डीआईजी से मिली थी। डीआईजी के
आदेश पर ही कार्रवाई हुई।
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बिटिया के पापा नेक इंसान थे।
उनकी मौत के बाद जीपीएफ को लेकर पहली पत्नी ने प्रतिवाद किया। जीपीएफ और
पेंशन का मामला लंबित है। हां, बिटिया के पापा की पहली पत्नी ने आरटीआई के
तहत दूसरी पत्नी के संबंध में जवाब भी मांगा था।
- प्रधानाचार्य, संबंधित कॉलेज।