- 1988 से 2017 के चुनाव तक सिर्फ एक बार ही मीर खानदान के हाथ से फिसली है नगर पालिका की सीट
अमर उजाला ब्यूरो
बदायूं। सहसवान नगर परिषद का एक अपना अलग मिजाज रहा है। यहां की राजनीति में सियासी पार्टियों से ज्यादा मीर खानदान का दखल ज्यादा रहता है। वर्ष 1988 से लेकर 2017 के चुनाव तक सिर्फ एक बार ही चेयरमैन पद इस खानदान के हाथ से फिसला है। वर्ष 2012 के चुनाव में निर्दलीय नूरउद्दीन चेयरमैन पद पर काबिज हुए, लेकिन अगले ही चुनाव यानी वर्ष 2017 में मीर खानदान के हादी अली उर्फ बाबर मियां ने निर्दलीय चुनाव लड़कर नूरउद्दीन से सीट छीन ली। बाबर मियां का इस बार भी निर्दलीय चुनाव मैदान में आना तय है, लेकिन इस बार उन्हें खानदान से ही चुनौती मिलने के कयास लगाए जा रहे हैं।
इधर, भाजपा से अनुज माहेश्वरी, दीक्षा माहेश्वरी और अवढर शर्मा के नाम चर्चा में हैं। अनुज भाजपा के टिकट पर 2017 का चुनाव लड़ चुके हैं। तब वह 6998 मत पाकर दूसरे स्थान पर रहे थे। सपा से टिकट के लिए वासित हुसैन और शुएब नकवी का नाम चल रहा है। बसपा से पूर्व विधायक अफजल अली उर्फ अच्छे मियां की पत्नी निकहत अली की दावेदारी मजबूत मानी जा रही है। हालांकि बसपा से राशिद खान और नवाब मारूफ भी टिकट के लिए जोड़तोड़ कर रहे हैं। उधर, पूर्व चेयरमैन नूरउद्दीन भी निर्दलीय चुनाव मैदान में आने की तैयारी में हैं।
वर्ष 2017 के चुनाव के आंकड़ों पर गौर करें तो मुस्लिम बहुल इस सीट पर भाजपा दूसरे स्थान पर रही थी। निर्दलीय बाबर मियां 9576 मत पाकर विजयी रहे थे। उन्होंने भाजपा के अनुज माहेश्वरी को 2578 मतों के अंतर से हराया था। अनुज को 6998 वोट मिले थे। निर्दलीय नूर उद्दीन 6022 मत पाकर तीसरे और सपा के राशिद हुसैन 4147 मत पाकर चौथे स्थान पर रहे थे। बसपा के प्यारे मियां को 305 और कांग्रेस की मरियम बेगम को 279 वोट मिले थे।
जातिगत आंकड़ों की बात करें तो 56280 मतदाताओं वाली सहसवान नगर पालिका परिषद में सर्वाधिक करीब 38000 मुस्लिम मतदाता हैं। इनमें 12000 पठान, करीब 5000 कुरैशी और 6500 अंसारी हैं। हिंदू मतदाताओं की संख्या करीब 18 हजार है। इनमें करीब तीन हजार वैश्य, 3200 मौर्य-शाक्य और लगभग 2900 कश्यप बिरादरी के मतदाता हैं।
राजा सहस्त्रबाहु की राजधानी थी सहसवान
सहसवान नगर की ऐतिहासिकता की बात करें तो ब्रिटिश शासनकाल में जिला मुख्यालय होने का गौरव हासिल करने वाला सहसवान नगर कई पौराणिक और ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी रहा है। कहा जाता है कि राजा सहस्त्रबाहु की राजधानी होने के कारण ही कालांतर में इसका नाम सहसवान पड़ा। राजा सहस्त्रबाहु से महर्षि परशुराम का युद्ध भी यहीं हुआ था। इसका प्रमाण सप्तस्रोत के रूप में आज भी मौजूद है। एक जमाना था जब केवड़ा के उत्पादन में सहसवान की पूरे देश में धाक थी।
रोडवेज बस अड्डे पर बसें न आना सबसे बड़ी समस्या
सहसवान बदायूं-दिल्ली हाईवे से जुड़ा होने के कारण यहां यातायात की बेहतर सुविधा है, लेकिन रोडवेज की बसें नगर के बस स्टैंड पर आने के बजाय बाहर से ही निकल जाती हैं। इससे लोगों को तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। सबसे ज्यादा दिक्कत रात के समय सफर करने वालों को होती है। तब ऑटो या ई-रिक्शा भी नहीं मिलते। लोगों का कहना है कि चाहे जो चेयरमैन रहा हो, कभी किसी ने इस समस्या से निजात दिलाने के लिए पैरवी नहीं की।
सप्तस्रोत का पर्यटकस्थल घोषित न होना भी मुद्दा
नगर के पौराणिक क्षेत्र सप्तस्रोत (सरसोता) को पर्यटक स्थल घोषित करने की मांग यहां के हिंदू वर्ग के लोग लंबे समय से कर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में यहां जिला पंचायत के अलावा जिला प्रशासन ने भी विभिन्न संसाधनों से विकास के कुछ काम कराए हैं, लेकिन लोगों का मानना है कि अगर यह क्षेत्र पर्यटक स्थल के रूप में विकसित हो जाए तो प्रदेश में इसे पहचान मिल सकती है।
नहीं पूरी हो रही सहसवान के रेलवे लाइन से जुड़ने की आस बबराला से सहसवान होकर बदायूं के लिए रेलवे लाइन बिछाने का मुद्दा भी वर्षों पुराना है। हर चुनाव में जनता इस मुद्दे को उठाती है। आश्वासन भी मिलते हैं, लेकिन ठोस पैरवी न होने के कारण मंजूरी नहीं मिल पा रही है। हालांकि केंद्र सरकार की पहल पर एक बार इस रेलवे लाइन के लिए सर्वे भी हो चुका है। सांसद संघमित्रा मौर्य सदन में इस मुद्दे को उठा भी चुकी हैं, लेकिन फिर भी बात आगे नहीं बढ़ी है।
वर्ष 1988 से अब तक चुने गए चेयरमैन
नाम कार्यकाल
मीर मजहर अली उर्फ नन्हे मियां 01.12.1988 से 15.01.1994
तसलीम जहां 01.12.1995 से 30.11.2000
मीर यूसुफ अली उर्फ मुन्नू मियां 01.12.2000 से 30.11.2005
बेगम शमा अली 15.11.2006 से 26.06.2008
बेगम शमा अली 30.11.2011 से 31.12.2011
हाजी नूर उद्दीन 18.07.2012 से 24.07.2017
मीर हादी अली उर्फ बाबर मियां 12.12.2017 से दिसंबर 2017