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Budaun News: दमन से कुचली अयोध्या, तू उदास न हो...

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विश्वनाथ माहौर।
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भाजपा के पूर्व प्रांतीय परिषद सदस्य ने सुनाई आपबीती
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संवाद न्यूज एजेंसी
बदायूं। ये वो दौर था जब हर हिन्दू अयोध्या जाने को आतुर था। कुछ भाग्यशाली वहां पहुंच गए तो कुछ को रास्ते में ही गिरफ्तार कर लिया गया। जिन लोगों ने बलिदान दिया, वे तो अविस्मरणीय है ही, लेकिन उनका योगदान भी अयोध्या आंदोलन में कम नहीं हैं जिनको गिरफ्तार कर जेल में अपराधियों की तरह ठूंस दिया गया। यहां उन्होंने जो यातना भरे दिन गुजारे, उसे सुनकर ही शरीर में सिहरन होने लगती है। उन्हीं में से एक थे भाजपा के पूर्व प्रांतीय परिषद सदस्य सुरजीव गुप्ता।
उन दिनों की याद करते हुए सुरजीव बताते हैं कि उस समय ‘दमन से कुचली अयोध्या, तू उदास न हो, हम बांध सिर से कफन एक दिन फिर वहीं से गुजरेंगे’ और ‘रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे’ जैसे नारे सुनाई देते थे। हर कोई बस यही चाहता था कि कैसे भी कारसेवा में जाना है लेकिन पुलिस गिरफ्तार करके जेल भेजे जा रही थी।
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गली-मोहल्लों में जोशीले युवा नारे लगा रहे थे तो घरों में भी बस जय श्रीराम सुनाई दे रहा था। बताते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निर्देश पर बदायूं से युवाओं को अयोध्या ले जाने का दायित्व उन पर भी था। इसी कारण 36 युवाओं को लेकर अयोध्या की ओर प्रस्थान कर दिया और यही से पुलिस के साथ मानो संघर्ष शुरू हो गया।
एक जगह से निकलने के बाद कई जगहों पर पुलिस को गच्चा दिया लेकन छह सड़का पर पुलिस ने नाकेबंदी के दौरान सभी को पकड़कर पीलीभीत जेल भेज दिया। यहां पूरे 22 दिन गुजारे। जेल में पूर्व मंत्री स्व. कृष्णस्वरूप वैश्य, पूर्व विधायक प्रेमस्वरूप पाठक, अवनीश कुमार सिंह भी थे।
बोले-बड़े ही यातना भरे दिन थे, अपराधियों जैसा सुलूक किया जाता था, पर आज जब मंदिर बन रहा है तो उन दिनों में इस यातना को भी अपनी एक आहुति मानते हैं। आज कारसेवकों का बलिदान और संघर्ष रंग लाया है।
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दिन में भूमिगत... रात में पूछते थे कारसेवकों के परिजनों का हाल

- भाजपा नेता विश्वनाथ माहौर और राकेश वाल्मीकि ने सुनाई दास्तां
संवाद न्यूज एजेंसी
उझानी। राम मंदिर निर्माण के लिए लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा के दौरान यहां से पीलीभीत जेल गए हिंदूवादी संगठनों के नेता विश्वनाथ माहौर और राकेश वाल्मीकि भी थे। राकेश तो अपने बीमार बेटे मोहित प्रभाकर को दवा दिलाने के बाद पत्नी के हवाले कर गए थे। उधर, माहौर दिन में भूमिगत रहते तो रात में कारसेवक साथियों के परिजनों का हाल जानने निकल पड़ते थे। बाद में उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया था।

साहूकारा मोहल्ला निवासी विश्वनाथ माहौर उस वक्त भाजपा नगर कमेटी के महामंत्री थे। माहौर बताते हैं कि रथयात्रा के दौरान कारसेवा शुरू हुई तो उनके कई साथियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। उसी दौरान पार्टी के जिला स्तरीय नेताओं से उन्हें निर्देश मिला कि वह अपने साथियों के परिजनों का ख्याल रखने के लिए भूमिगत हो जाएं।
इसी निर्देश के तहत वह रात में कारसेवकों के परिजनों के घर जाकर उनका हाल जानते थे। दिन में भूमिगत हो जाते थे। 29 नवंबर को उन्होंने पार्टी के नगर अध्यक्ष जगन्नाथ अदलक्खा के नेतृत्व में गिरफ्तारी दी। उन्होंने पीलीभीत की जेल में 18 दिन गुजारे। उस दौरान पार्टी के नेताओं का भी सानिध्य प्राप्त हुआ।
पीलीभीत जेल में करीब 33 दिन गुजारने वाले बाजारकलां मोहल्ला निवासी राकेश वाल्मीकि उस वक्त नगर पालिका परिषद में मनोनीत सदस्य थे। जिस समय कारसेवकों को पकड़ने के लिए पुलिस ने अभियान चला रखा था, तब राकेश के पुत्र मोहित प्रभाकर बीमार थे। राकेश ने बताया कि मंदिर के प्रति उनकी निष्ठा का आलम यह रहा कि उन्होंने बीमार बेटे को दवा दिलाने के बाद फिर मुड़कर पीछे नहीं देखा।
पत्नी से कह दिया कि दिक्कत हो तो किसी भी कारसेवक के परिजन के सहयोग से बेटे का दवा दिला लाना। 10 नवंबर को राकेश ने गिरफ्तारी के दौरान पुलिस के सामने ही जय श्रीराम के नारे लगाए थे। राकेश के साथ ही नंदकिशोर जैन, सत्यभान सराफ और रामकिशोर की भी गिरफ्तारी हुई थी।
राकेश इस समय पालिका में सफाई नायक हैं। जेल के दिनों के स्मरण सुनाते हुए बोले- कृष्ण स्वरूप वैश्य और प्रेम स्वरूप पाठक ने उनका हौसला बढ़ाया था। जेल में जब भी किसी कारसेवक को दिक्कत होती, तब वह भी आवाज उठाने वालों में पीछे नहीं रहते थे।
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पकड़े नहीं जाते तो अयोध्या पहुंच जाते राकेश
राकेश वाल्मीकि कहते हैं कि उनकी इच्छा अयोध्या जाकर कारसेवा करने की थी। पत्नी समेत संघ के नेताओं को भी उन्होंने अवगत करा दिया था। उसी दौरान पुलिस ने कारसेवा की तैयारियों में जुटे नेताओं की गिरफ्तारी को अभियान चलाया। वह बेटे का दवा दिलाकर जैसे ही दरवाजे की ओर बढ़े, उसी दौरान धोखे से पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। पुलिस कर्मियों ने कहा था कि थाने से छोड़ देंगे, लेकिन रात में एक बजे उन्हें ट्रक के जरिये जेल भेज दिया गया। उन्हें अयोध्या नहीं पहुंच पाने का आज भी मलाल है।

विश्वनाथ माहौर।

विश्वनाथ माहौर।

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