स्योहारा के जमाल शेख को पैतृक संपत्ति के साथ वसीयत में मिला गौरैया का कुनबा
आज भी निभा रहे 24 साल पहले पिता को दिया वचन, आंगन में फुदकती हैं दो हजार गौरैया
-सुबह साढ़े पांच बजे डाल देते हैं दाना, रात में बंद रहती है लाइट
फोटो
रजनीश त्यागी। हवेली भी तेरी और गौरैया भी तेरी... पुश्तैनी संपत्ति की वसीयत करते समय स्योहारा के अकबर हुसैन शेख ने यह बात अपने बेटे जमाल शेख से कही थी। जमाल इस वसीयत को खूब निभा रहे हैं और इनका पूरा नन्हीं चिड़ियों का ध्यान रख रहा है। जमाल के आंगन में दर्जनों में नहीं, बल्कि दो हजार से ज्यादा गौरैया हर समय फुदकती दिख जाएंगी।
हवेली करीब 300 साल पुरानी है। इसमें पहले लकड़ी की कड़ी पड़ी हुई थी। इन्हीं में नन्हीं गौरैया रहती थी। पक्की और ईंटों व कांक्रीट की छतों वाले मकानों से गौरैया लुप्त हो रही है। अकबर हुसैन आज से 24 साल पहले आ रहे बदलाव और गौरैया पर संकट को भांप गए थे। उन्होंने 1999 में वसीयत गौरैया के संरक्षण का भी ध्यान रखने के लिए बेटे से कहा था, यही वजह है कि मोहल्ला शेखनान में जमाल शेख के आंगन में लगे पेड़ों पर दो हजार से ज्यादा गौरैया देखी जा सकती है। जमाल शेख बताते हैं कि वह सुबह साढ़े पांच बजे ही इनके लिए दाने का इंतजाम कर देते हैं। सर्दियों में बाजरा, गेहूं डालते हैं तो गर्मियों टूटे चावल डालते हैं। सुबह दाना डालने के बाद ही वह काम पर जाते हैं। उन्हें लगता है कि इनकी वजह से ही समाज में इज्जत मिल रही है। यदि परिवार को शादी में या किसी अन्य कार्य से कहीं जाना होता है तो किसी को इनके लिए दाना पानी का इंतजाम करने की जिम्मेदारी देकर जाते हैं।
पिता ने कहा था गौरैया की खिदमत करना
माता-पिता इनके लिए रोज दाना, पानी का इंतजाम करते थे। हमें भी बचपन से ही इनसे लगाव हो गया। हवेली में लकड़ी की कड़ी हटाकर लिंटर डाला तो आंगन में अमरूद, बेल और अनार के पेड़ लगवाए, जिनपर आकर गौरैया रहने लगी। पिता ने वसीयत में हवेली के साथ इन नन्हीं चिड़ियों की देखभाल का वादा भी लिया था और कहा था कि इनकी खिदमत करना। पूरा परिवार मिलकर इसे निभा रहा है। जमाल शेख, निवासी स्योहारा
विकास और गौरैया संरक्षण का अद्भुत संगमः एसडीओ
मुंझे पता चला कि स्योहारा में एक घर में गौरैया है तो रहा नहीं गया। जमाल शेख की हवेली में जैसे ही घुसा, वहां पेड़ों पर हजारों गौरैया देखी। एक घर में इतनी बड़ी संख्या में इन्हें देख मैं हैरान था। हमने वन विभाग की ओर से उस घर में घौंसले भी लगवाएं हैं। अब वहां गौरैया ही नहीं अन्य पक्षी भी आते हैं। यह विकास और गौरैया संरक्षण का अद्भुत संगम था। ज्ञान सिंह, एसडीओ वन विभाग
पवन चम्मच से पिलाते हैं गौरैया को पानी
बिजनौर की साहित्य विहार निवासी पवन राजपूत ने अपने घर में गौरैया के लिए घौंसले लगाए। नन्हीं चिड़ियों को घर मिला तो इन्होंने भी पवन राजपूत से दोस्ती कर ली। अब पवन राजपूत अपने हाथ से जहां इन्हें दाना खिलाते हैं, चम्मत से इन्हें पानी भी पिलाते हैं। पवन राजपूत कहते हैं कि बनावटी चीजों से नहीं, बल्कि प्रकृति की सुंदरता आपके मकान को घर बनाती हैं।
शहरों से गुम हुई, गांवों में सुनाई देती है गौरैया की चहचहाहट
बढ़ापुर-बिजनौर। स्वच्छ व स्वस्थ वातावरण की प्रतीक गौरैया की चहचहाहट अब सिर्फ गांवों में ही सुनाई देती है। शहरों से यह गुम हो गई है। दो दशक में ही गौरैया की संख्या 70 प्रतिशत से घट गई।
गौरेया कच्चे मकानों की छतों, झरोखे, छत में लगी कडि़यों में अपना आशियाना बनाती थी। जैसे-जैसे पक्के मकान बनने लगे, इनका ठिकाना भी खत्म होता चला गया। पेड़ों का सहारा था, लेकिन वह भी कम हो रहे हैं। वन विभाग के एसडीओ ज्ञान सिंह कहते हैं कि मुख्य रूप से भोजन, पानी, घर और सुरक्षा से इस नन्हीं चिड़िया को संरक्षित कर सकते हैं। हम अपने घरों में यदि पानी रखें, कुछ घौंसले बनाकर टांग दें तो भी गौरैया आनी शुरू हो जाएगी। वन क्षेत्राधिकारी कपिल कुमार और वनक्षेत्राधिकारी साहूवाला इरफान अंसारी का कहना है कि पक्षी और जीव-जंतु प्रकृति का उपहार है। गौरैया के लिए घरों की छत पर दाना-पानी की व्यवस्था करने की जरूरत है। संवाद
ऐसे बढ़ेगा गौरैया का कुनबा
- छत, पार्क व बालकनी में बर्तन में दाना पानी भरकर रखें।
- प्रजनन के समय उनके अंडों की सुरक्षा का भी ध्यान रखें।
- घर के बाहर ऊंचाई व सुरक्षित जगह लकड़ी के घोंसले लगाएं।
- आंगन- पार्कों में कनेर, नींबू, अमरूद, अनार, बांस के पौधे लगाएं।