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हिंदी से रहेंगे अनजान, जब गुरु जी ही नहीं हैं देने को ज्ञान

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हिंदी से रहेंगे अनजान, जब गुरु जी ही नहीं हैं देने को ज्ञान
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बिजनौर। आज हिंदी दिवस है। हिन्दी के प्रचार-प्रसार पर बल है, लेकिन जिले के राजकीय व अशासकीय सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में ही हिंदी विषय के शिक्षक नहीं है। दफ्तरों में भी आजादी के 75 साल बाद भी अंग्रेजी मानसिकता हावी है। शिक्षाविदों का मानना है कि हिंदी के उत्थान के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं।
14 सितंबर हिंदी दिवस है। हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए कार्यक्रम होते हैं, लेकिन बड़ा प्रश्न ये है कि जब शिक्षण संस्थाओं में हिंदी विषय पढ़ाने वाले शिक्षक न हो तो हिंदी का विकास कैसे होगा। जिले में 37 राजकीय हाईस्कूल व इंटर कालेज, 73 अशासकीय सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालय और 282 वित्त विहीन माध्यमिक विद्यालय है।
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राजकीय तथा अशासकीय सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति शासन से होती है। प्राप्त जानकारी के अनुसार जिले में केवल राजकीय बालिका इंटर कालेज किरतपुर में हिंदी प्रवक्ता है। 17 राजकीय इंटर कालेज में हिंदी प्रवक्ता नहीं है।
राजकीय कालेजों में हाईस्कूल तक हिंदी पढ़ाने वाले 15 शिक्षक हैं। 30 शिक्षकों की कमी है। अशासकीय सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में भी हिंदी पढ़ाने वाले शिक्षकों की कमोवेश यही स्थिति है। शासकीय सहायता प्राप्त विद्यालयों में भी हिंदी पढ़ाने के लिए मानदेय पर शिक्षक रखते हैं। हालात ये हैं कि अधिकांश स्कूलों में हिंदी पर नहीं बल्कि अंग्रेजी, गणित और विज्ञान जैसे विषयों पर ज्यादा जोर होता है। जिस कारण इनके ही विशेषज्ञ शिक्षकों की नियुक्ति पर ज्यादा जोर रहता है।
13 साल से नहीं हुई नियुक्ति
राजकीय इंटर कालेजों में करीब 13 साल से हिंदी विषय के शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हुई है। राजकीय शिक्षक संघ के जिला महामंत्री अमित कुमार शर्मा ने बताया कि शिक्षकों की सेवानिवृत्ति लगातार बढ़ रही। वर्ष 2009 के बाद हिंदी प्रवक्ता की नियुक्ति नहीं हुई है। वर्ष 2013 के बाद स्नातक वेतन क्रम में इस साल शिक्षक नियुक्त हुए, लेकिन जिले को अनुपातिक विषयवार शिक्षक नहीं मिले। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ के जिला अध्यक्ष रवींद्र कुमार के अनुसार शासकीय सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में आयोग से शिक्षकों की नियुक्ति की प्रक्रिया धीमी है।
दूसरे बोर्ड में तो हालात और भी ज्यादा खराब
उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद के साथ ही सीबीएसई और आईसीएसई के स्कूल भी संचालित हैं। इन स्कूलों की हालत तो हिंदी को लेकर और भी ज्यादा खराब है। यहां हिंदी सरकारी आदेश के चलते अनिवार्य विषय तो है, लेकिन उसके लिए विशेषज्ञ शिक्षक रखने पर कोई जोर नहीं होता है। इन स्कूलों में शिक्षक और बच्चे जहां हिंदी के स्थान पर अंग्रेजी में ही बात करते हैं, तो पढ़ाई में भी हिंदी से इतर अन्य विषयों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है।
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नहीं बदल रही दफ्तरों की मानसिकता
शासन से हिंदी दिवस पर दफ्तरों में रोजाना के कामकाज में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा दिए जाने पर बल दिया जाता है। हिंदी सप्ताह मनाए जाते हैं, लेकिन सब कुछ फाइलों तक ही सीमित दिखाई पड़ता है। हिंदी के प्रयोग को लेकर दफ्तरों की मानसिकता बदलती नहीं दिख रही। वर्धमान कालेज बिजनौर में बीएड विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सुनील कुमार जोशी का कहना है कि हिंदी के उत्थान के लिए प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है।
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