आज भी आजाद हिंद फौज के सेनानियों के परिजन जाते हैं दर्शन करने
आजादी के बाद जिले में बसाए गए थे आजाद हिंद फौज के 48 सैनिकों के परिवार
विवेक गुप्ता
फोटो समाचार
बिजनौर/कोतवाली देहात। आजादी के बाद आजाद हिंद फौज के सैनिकों के परिजन आज भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस को अपना नायक मानते हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी ये लोग उन स्थानों की यात्रा करते हैं, जहां देश को आजाद कराने के लिए उनके पूर्वजों ने अंग्रेजों से जंग लड़ी थी। इनके लिए वो स्थान किसी तीर्थ से कम नहीं है और हर साल तीर्थ यात्रा की तरह वहां दर्शन करने जाते हैं।
आजादी के बाद आजाद हिंद फौज के 48 सेनानियों के परिवारों को कादराबाद क्षेत्र के 12 गांवों में बसाया गया था। फौज में शामिल रहे शेर सिंह के पुत्र ग्राम जामुनवाला निवासी राजेंद्र सिंह नेगी बताते हैं कि उनके पिता गढ़वाल राइफल में थे। वह आजाद हिंद फौज की ओर से लड़े। यह लड़ाई द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हो रही थी। जब वह नागालैंड में लड़ रहे थे तभी उन्हें अंग्रेजी सेना ने बंदी बना लिया था। लाल किले में उन पर मुकदमा चलाया गया। वह नौ साल तक मुल्तान (अब पाकिस्तान में) की जेल में बंद रहे। इस दौरान शेर सिंह ने जेल में रहते हुए डायरी लिखी। यह डायरी आज भी उनके परिजनों के पास सुरक्षित है। उनके पिता जीवित रहे, तब तक वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस का गुणगान करते रहे। उनके पिता ने कभी भी यह स्वीकार नहीं किया कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस विमान दुर्घटना में मारे गए हैं।
आजाद हिंद फौज के लिए खुशहाल सिंह युद्ध बंदी के रूप में क्वेटा जेल (अब पाकिस्तान में) में रहे। उनके पौत्र कनिष्क सिंह नेगी बताते हैं कि देश की आजादी के बाद 1952 में भारत सरकार ने आजाद हिंद फौज के 48 परिवारों को कादराबाद क्षेत्र के गांव कादराबाद, मुरलीवाला, रसूलाबाद, तुरतपुर, चकफेरी, लड्डूवाला, जामुनवाला, भिक्कावाला, कल्लूवाला, मीरापुर उत्तर, मीरापुर दक्षिण और नवाबपुरा गांव में कॉलोनी बनाकर बसाया था।
कनिष्क नेगी बताते हैं कि आजाद हिंद फौज के परिवार आज भी नेताजी से जुड़े हुए स्थलों की प्रतिवर्ष यात्रा करते हैं। वह इस यात्रा को तीर्थ यात्रा की तरह करते हैं। प्रतिवर्ष 21 अक्टूबर को सिक्किम और 30 दिसंबर को अंडमान निकोबार की यात्रा के लिए रवाना होते हैं और नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़े स्थलों के दर्शन करते हैं। संवाद