मंडावली क्षेत्र का स्वयंभू मोटा महादेव मंदिर।
हरिद्वार से कांवड़ लाने वाले शिवभक्त मोटा महादेव मंदिर पर सर्वप्रथम जल चढ़ाते हैं। मान्यता है कि मोटा महादेव मंदिर में भगवान शिव का जलाभिषेक करने वालों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। श्रावण मास और महाशिवरात्रि पर हरिद्वार से गंगाजल और कांवड़ लाने वाले लाखों शिवभक्त यहां जल चढ़ाने के बाद ही अपनी मंजिल की ओर बढ़ते हैं।
यूं तो स्वयंभू मोटामहादेव मंदिर मौर्य काल के वक्त से बताया जाता है, लेकिन 1780 में साहनपुर रियासत के राजाओं ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। मंदिर के महंत शशिनाथ बताते हैं कि सदियों पहले उक्त स्थान पर शिवलिंग धरती से प्रकट हुआ था। साहनपुर रियासत के राजा चरत सिंह ने मंदिर को विस्तृत रूप देने का कार्य किया था।
मंदिर परिसर में भैरव बाबा का मंदिर भी है, भगवान शिव का जलाभिषेक करने के उपरांत शिवभक्त भैरव बाबा मंदिर में पुजारी शशिनाथ से सोटा लगवाते है, जिससे शिवभक्तों के दुख-दर्द और सफर की थकान दूर हो जाती है। हरिद्वार से गंगाजल और कांवड़ लाने वाले शिवभक्तों के लिए पहला पड़ाव मोटा महादेव मंदिर ही पड़ता है। यहां जल चढ़ाने के बाद ही शिवभक्त अपनी मंजिल की तरफ बढ़ते हैं।
खाली हो जाती है गंगाजल की शीशी
हरिद्वार से कांवड़ उठाते वक्त मोटा महादेव मंदिर में भगवान शिव के जलाभिषेक के लिए शिवभक्तों को अलग से एक शीशी में गंगाजल दिया जाता है। मोटा महादेव मंदिर पहुंचने पर कांवड़िये उसी शीशी के जल से भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। मान्यता है कि यदि कोई शिवभक्त मंदिर में जल चढ़ाए बिना ही आगे बढ़ जाता है तो उस शीशी का गंगाजल अपने आप ही सूख जाता है।
श्रावण के प्रत्येक सोमवार को उमड़ती है श्रद्धालुओं भीड़
श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार और महाशिवरात्रि को कांवड़ियों सहित क्षेत्रीय श्रद्धालु बड़ी संख्या में मोटा महादेव मंदिर पहुंचते हैं। महंत शशिनाथ ने बताया कि श्रावण के पहले सोमवार को मंदिर पर जलाभिषेक के लिए सुबह पांच बजे से अपराह्न तीन बजे तक श्रद्धालुओं की लाइन लगी थी। कांवड़ यात्रा के दौरान मंदिर परिसर पर भंडारे की व्यवस्था होती है।