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Bijnor News: अमानगढ़ में गिद्धों का झुंड देख उत्साहित हुए पर्यटक

Sun, 27 Nov 2022 06:30 AM IST
मेरठ ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बिजनौर

सार

पक्षी विशेषज्ञों की मानें तो गिद्ध  ऊंचे पेड़ों पर अपना घोंसला बनाते हैं। इनका सबसे पसंदीदा आवास सेमल के पेड़ होते हैं। पिछले कुछ वर्षों में सेमल के पेड़ों का कटान हुआ है। जिससे गिद्ध का प्राकृतिक आवास छिन रहा है।
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अमानगढ़ के जंगल में बैठे गिद्ध। - फोटो : BIJNOR
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विस्तार
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अमानगढ़ यूं तो वन्यजीवों के लिए जाना जाता है, लेकिन यहां पर बड़ी संख्या में गिद्ध संरक्षण भी हो रहा है। जंगल सफारी करने गए पर्यटक शनिवार को गिद्धों का झुंड देखकर उत्साहित हो उठे। वन विभाग की गणना में अमानगढ़ रेंज में 165 गिद्ध बताए गए। बिजनौर डिवीजन में यह अकेली ऐसी रेंज है जहां पर गिद्धों की मौजूदगी है।

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अमानगढ़ में रोजाना पर्यटक जंगल सफारी के लिए जा रहे हैं। इस दौरान पर्यटकों को हाथी, हिरण, बाघ जैसे वन्यजीव देखने को मिल रहे हैं। शनिवार को वन्यजीवों के साथ-साथ पर्यटकों के एक दल को गिद्धों का झुंड भी दिखाई दिया।

यह झुंड बाघ द्वारा मारे गए वन्यजीव के अवशेषों को खाता हुआ दिखा। पर्यटकों ने इसकी तस्वीर कैमरे में कैद कर लिया। इसके अलावा पर्यटक को दो हाथी के साथ एक बच्चा भी दिखाई पड़ा।
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तीन दिवसीय गिद्ध गणना में अमानगढ़ में 122 वयस्क और 43 बच्चे दिखाई दिए। अन्य किसी रेंज में गिद्ध नहीं दिखाई दिए थे। विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके गिद्धों का कुनबा यहां खूब फल फूल रहा है। इस गणना के दौरान अमानगढ़ में हर बीट में गिद्ध दिखाई दिए। वन विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक कोठिरो बीट में नदी और वृक्षों के ऊपर टीम को 61 वयस्क और 20 बच्चे, अमानगढ़ गेस्ट हाउस के पास 12 वयस्क और तीन बच्चे, लालपुरी बीट में पीली नदी के किनारे 13 वयस्क, पांच बच्चे, किरतपुर बीट में 10 वयस्क और चार बच्चे, झूल्लो बीट में 13 वयस्क और पांच बच्चे, जसपुर बीट में कोठीरो नदी के पास 12 वयस्क और छह बच्चे दिखाई दिए।

कम हो रहा गिद्धों का प्राकृतवास
पक्षी विशेषज्ञों की मानें तो गिद्ध  ऊंचे पेड़ों पर अपना घोंसला बनाते हैं। इनका सबसे पसंदीदा आवास सेमल के पेड़ होते हैं। पिछले कुछ वर्षों में सेमल के पेड़ों का कटान हुआ है। जिससे गिद्धों का प्राकृतिक आवास छिन रहा है। पर्यावरण विदों और पक्षी प्रेमियों का यह मानना है कि गिद्घों और दूसरे परिंदों को बचाने के लिए पेड़ों को बचाया जाना बेहद जरूरी है।

गिद्धों के कम होने के लिए डाइक्लोफिनेक जिम्मेदार
90 के दशक तक गिद्धों की संख्या हजारों में थी। आबादी के आसपास भी गिद्ध बड़ी संख्या में देखने को मिल जाते थे। पक्षी विशेषज्ञों का कहना है कि डाइक्लोफिनेक दवा का इस्तेमाल कर चुके पशुओं की किसी कारण से मौत हो जाने पर उसका मांस खाने से गिद्धों की मौत हो रही थी। डाइक्लोफिनेक दवा के दुष्प्रभाव से गिद्धों की संख्या में आ रही कमी से चिंतित सरकार ने इस दवा को प्रतिबंधित कर दिया था। वर्ष 2000 तक 95 से 98 प्रतिशत गिद्ध कम हो चुके थे, केवल आरक्षित वन क्षेत्रों में ही अब गिद्ध देखने को मिल जाते हैं।

वन विभाग गिद्धों के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए प्रयास कर रहा है। आरक्षित वन क्षेत्र में गिद्धों की मौजूदगी है। अमानगढ़ में हाल ही में घटना हुई थी। पहले के मुकाबले ज्यादा गिद्ध देखने को मिले - डॉ. अनिल कुमार पटेल, डीएफओ बिजनौर
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