बच्चों को उठा ले जाते थे भेड़िए
कोकापुर के रहने वाले विजयपाल सिंह बताते हैं कि रेतीले जंगलों में भेड़िए रहते थे। 1880 के बाद इनकी संख्या कम होती चली गई। भेड़िए गांव की आबादी में घुसकर बच्चों को उठा ले जाते थे। तब भेड़ियों का बहुत डर हुआ करता था। अब भेड़िए जिले में कहीं दिखाई नहीं देऐ। अब भेड़िए चिड़ियाघरों की शोभा बढ़ा रहे हैं।
भूड़ क्षेत्र में रहते थे भेड़िए
चांदपुर के रहने वाले केडी सिंह बताते हैंं कि रावटी तिगरी के बीच से होकर एक भूड़ थी, जो दस से पंंद्रह किलोमीटर लंबी थी। इसे मोचनी की भूड़ कहा जाता था, जिसमें सबसे अधिक भेड़िए रहते थे। पंद्रह से बीस किलोमीटर तक भेड़ियों का आतंक था। चांदपुर के एक शिकारी मोहम्मद अख्तर हुआ करते थे, जो नरभक्षी भेड़ियों का शिकार करके चांदपुर में जनता को दिखाने के लिए रखते थे। यह साल 1970 से 90 के बीच की बात है।
गुलदार और बाघ कर लेते हैं भेड़ियों का शिकार
गुलदार और बाघ, भेड़ियों का शिकार कर लेते हैं। जिले में गुलदारों की संख्या करीब 150 है। हो सकता है कि भेड़ियों का गुलदारों या बाघ ने शिकार कर लिया हो। लेकिन अभी भी कुछ जगहों पर भेड़िए हैं। जिले में कितने भेड़िए हैं, यह कहा नहीं जा सकता, क्योंकि भेड़ियों की गणना नहीं कराई जाती। जंगल का ईको सिस्टम भी किसी प्रजाति के घटने या बढ़ने की वजह रहता है - ज्ञान सिंह, एसडीओ वन विभाग