- जिले में 400 से ज्यादा साहूकार लाइसेंस हुए निरस्त
- अब साहूकारा किया तो होगी कानूनी कार्रवाई
- एडीएम बोले, पुराने कर्जे को ही वसूल कसते हैं ये लोग
रजनीश त्यागी
बिजनौर। “लेखा जौ जौ, बक्सीस सौ सौ। ये लाइनें आपको साहूकारा और मुंशी प्रेमचंद की कहानी सवा शेर गेहूं की याद ताजा कर देंगी। दशकों पहले यह कहानी जरूर लिखी गई थी, लेकिन ग्रामीण अंचलों में आज भी ऐसे बेबस शंकर या हल्कू मिल जाएंगे, जो साहूकारों के कर्ज के जाल में फंसकर अपना सबकुछ गंवा बैठे हैं। गरीब ही क्यों, शहर के कई बड़े कारोबारी, प्रॉपर्टी वाले लोग भी केवल ब्याज-ब्याज में अपनी मूल संपत्ति भी गंवा चुके हैं, लेकिन अब कोई साहूकारी नहीं कर पाएगा, क्योंकि शासन की गाइडलाइन के बाद जिले में साहूकारी के सभी लाइसेंस निरस्त हो गए हैं। जिले में इनकी संख्या 400 से भी ज्यादा थी।
शासन के इस फैसले से गरीब तबके के लोगों को साहूकारों के शोषण से निजात मिल सकेगी। असल में उत्तर प्रदेश साहूकार अधिनियम, 1976 की घोषणा के समय बैंकिंग सेवाओं तथा ऑनलाइन बैंकिंग और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों का लाभ दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों व आम जनता के लिए इतनी सुलभ नहीं थी। ऐसे में साहूकारों से जरूरतमंद लोगों को कर्ज देते थे। अब वर्तमान की बात करें तो सरकारी बैंकों, गैर-सरकारी बैंकों और अन्य वित्तीय कंपनियों द्वारा साहूकारों की अपेक्षा काफी कम ब्याज दरों पर आम जनता को गोल्ड लोन, पर्सनल लोन, एजुकेशन लोन, वाहन लोन और अन्य प्रकार के लोन उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
इसी के चलते साहूकारा अधिनियम ही समाप्त कर दिया गया। इसका शासनादेश जिले में पहुंचा तो 400 से ज्यादा साहूकारों के लाइसेंस स्वत: ही निरस्त हो गए। प्रशासन अब जिले में साहूकारा करने वालों को विधिक कार्रवाई की चेतावनी दे रहा है। एडीएम प्रशासन विनय कुमार ने कहा कि कोई लाइसेंस न तो बनाया जाएगा और न ही रिन्युअल किया जाएगा। तय नियमों के तहत ही अधिनियम निरस्त होने से पहले दिया गया कर्ज ही वसूला जा सकता है। यहां पर साहूकारा के 400 से ज्यादा लाइसेंस थे। (संवाद)
इस तरह उठाया जाता था फायदा
साहूकार का लाइसेंस ज्यादातर सुनार द्वारा प्राप्त किया जाता था, लेकिन बिजनौर जिले में ऐसा नहीं है। यहां पर कई पैसे वालों ने यह लाइसेंस ले रखे थे। बताया जाता है कि जमीन, गहनों को गिरवी रखकर उच्च ब्याज दरों (18 प्रतिशत से 36 प्रतिशत) पर गिरवी वस्तु का 50 प्रतिशत तक ही ऋण दिया जाता था। ऐसे में कई मामलों में ऋण लेने वाले लोग कभी ब्याज नहीं चुका पाए और गहने हो या प्रापर्टी वह साहूकार की ही होकर रह गई। जिले में अब अधिकांश साहूकार इकरारनामा नहीं, बल्कि बैनामा कराकर किसानों को कर्ज दे रहे थे। ऐसे दर्जनों किसान हैं, जो अपनी जमीन कभी साहूकार से वापिस ही नहीं ले पाए।
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केस-1
शहर के एक मात्र मॉल को डेढ़ दशक पहले बनाया गया। सूत्रों की माने तो मॉल बनाने के लिए बड़े फाइनेंसरों से कर्ज लिया गया। उस कर्ज का ब्याज इतना अधिक था कि वह चुकाया ही नहीं जा सका। कई फाइनेंसरों की मॉल में दुकानें केवल ब्याज के पैसों में ही आ गईं। अब जो मूल मालिक थे, उनकी हिस्सेदारी न के बराबर ही है। वहीं अन्य लोगों का इसमें बड़ा शेयर है। इनमें से कुछ ने इसमें बतौर फाइनेंसर पैसा लगाया था।
केस-2
शहर में कुछ समय पहले कोतवाली शहर में एक केस दर्ज हुआ। इसमें आरोप लगाया गया कि जमीन को गिरवी रखकर एक फाइनेंसर से कर्ज लिया गया। यह फाइनेंसर साहूकारा का लाइसेंस भी रखते हैं। जमीन के मालिक का कहना था कि उसने कर्ज लौटाया, लेकिन साहूकार ने जमीन वापिस नहीं की। क्योंकि उसने बैनामे के जरिए वह जमीन गिरवी रखी थी। वह ब्याज के पैसे अधिक बता रहा था।