1658 में औरंगजेब ने शाहजहां को आगरा किले में बंदी बना लिया और खुद को शासक घोषित किया। दारा शिकोह को विश्वासघात के आरोप में फांसी दे दी गई थी। उस वक्त शाहजहां के खास सिपहसालार सैय्यद राजू हुआ करते थे। जिन्हें आगरा किले की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी। औरंगजेब का विरोध करने पर सैय्यद राजू की जान खतरे में पड़ गई थी।
औरंगजेब ने सैय़्यद राजू को पकड़ने के लिए वारंट जारी कर दिए थे। जिस पर सैय्यद राजू ने बिजनाैर के जोगीपुरा को अपना ठिकाना बना लिया। जो जोगीपुरा के निकट वन क्षेत्र में रहते थे। यहां आकर नाद ए अली की इबादत करने लगे। सैय्यद राजू सुबह वन में पहुंच जाते और बस्ती में मरगिब की नमाज के बाद ही आते थे।
बूढ़े ब्राह्मण को मिली थी आंखों की रोशनी
बतातें हैं कि एक दिन बूढ़ा ब्राह्मण वन में घास लेने गया था। तभी उसे घोड़ों के आने आहट सुनाई दी। ब्राह्मण ने समझा कि शाही फौज सैय्यद राजू को गिरफ्तार करने आ गई है। उसने वहां से भागना चाहा, तभी घोड़ों पर आए लश्कर के सरदार ने उसे बुलाया और सैय्यद राजू को बुलाकर लाने को कहा। ब्राह्मण ने कहा कि उसकी आंखें कमजोर हो गई हैं, इसलिए जल्दी नहीं पहुंच सकता। जिस पर ब्राह्मण को रोशनी की सौगात मिल गई थी।
ब्राह्मण के संदेशा पहुंचाने पर सैय्यद राजू मौके पर पहुंचे तो उस जगह घोड़े के मुंह के झाग और पैरों के निशान ही मिल पाए। इन निशानों को सुरक्षित रखने के लिए सैय्यद राजू ने ईंटों से एक चौकी बना दी थी, बाद में चौकी पर दरगाह की बुनियाद डाली। बाद में रामपुर के नवाब ने एक चौड़ी दरगाह और एक इमामबाड़ा बनवाया।