बिजनौर। कोरोना काल के बाद गुलदार की समस्या जिले में सबसे बड़ी समस्या में शामिल हो चुकी है। पिछले 18 माह में ही 22 लोग गुलदार के हमलों में जान गवां चुके हैं, वहीं 100 से ज्यादा घायल हो चुके हैं। चिंंताजनक बात यह है कि यह समस्या लगातार विकराल रूप धारण कर रही है, लेकिन समाधान शासन-प्रशासन किसी के पास नहीं है।
बिजनौर जिले की भौगोलिक स्थिति पर नजर डालें तो अमानगढ़ से लेकर नजीबाबाद तक घना जंगल है। अमानगढ़ में जहां बाघ से लेकर गुलदार तक की मौजूदगी है, वहीं नजीबाबाद डिविजन की अधिकांश रेंज में हाथी और गुलदार की मौजूदगी देखने को मिलती है। वर्तमान में नजर डालें तो रिजर्व फॉरेस्ट से ज्यादा गुलदार इस समय जिले के आबादी क्षेत्रों के जंगल में घूम रहे हैं। समय-समय पर हमले कर यह अपनी मौजूदगी भी दर्ज कराते रहते हैं। जहां लोगों की जान जा रही है, वहीं पिछले डेढ़ साल में 60 से ज्यादा गुलदार या तो पिंजरे में कैद हुए या इनमें कई सड़क दुर्घटना में मारे गए।
चिड़ियाघर से लेकर पड़ोसी जिलों तक ने इनकार किया
कुछ साल पहले तक अमरोहा से लेकर बरेली तक पकड़े गए गुलदार अमानगढ़ में छोड़े जाते थे। जिले में घटनाएं बढ़ीं तो अमानगढ़ में गुलदार छोड़ने पर रोक लगा दी गई। इसके बाद जिले में जो भी गुलदार पकड़े गए, उन्हें गोरखपुर, कानपुर, लखनऊ चिड़ियाघर, इटावा लायन सफारी भेजा गया। इनकी संख्या इतनी रही कि वहां से भी हाथ खड़े कर दिए गए। कुछ गुलदार सहारनपुर क्षेत्र के शिवालिक जंगलों में छोड़े गए, पर अब वहां के अफसरों ने भी गुलदार छोड़ने पर रोक लगा दी है।
गन्ने के खेतों में बसेरा, अब बचना सीखना होगा : जोएल लॉयल
जिम कार्बेट के रिसर्च स्कॉलर एवं वरिष्ठ वन्य जीव विशेषज्ञ जोएल लॉयल कहते हैं कि गुलदार ने गन्ने के खेतों में रहना सीख लिया है। लोगों को भी इनसे बचना सीखना होगा। यहां पर जो गुलदार के शावक पैदा हो रहे हैं, उनके लिए यही प्राकृतिक आवास है। ऐसे में यह समस्या और विकराल होती जाएगी। क्योंकि पूरा वेस्ट यूपी गन्ना क्षेत्र है। अकेले बिजनौर में तीन लाख हेक्टेयर के करीब गन्ने का क्षेत्रफल है।
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लोगों को किया जा रहा है जागरूक : ज्ञान सिंह
एसडीओ वन विभाग ने बताया कि जिले के लोगों को गुलदार से बचाव के लिए जागरूक किया जा रहा है। जहां भी सूचना मिलती है, पिंजरे लगाए जा रहे हैं। जागरूक अभियान और तेज किया जाएगा।