बिजनौर। गोगा जाहरवीर उर्फ जाहरपीर उर्फ जाहर दीवान की म्हाड़ी पर आस्था का सैलाब उमड़ा। करीब दो लाख श्रद्धालुओं ने मत्था टेका और प्रसाद चढ़ाया। जात देने वालों का भी तांता लगा रहा। दरअसल मनोकामना पूरी होने पर जात देने की परंपरा है, जिनका एक अलग ही ड्रेस कोड रहता है, जोकि पीले या सफेद कपड़े पहनकर की म्हाड़ी पर झंडी और प्रसाद चढ़ाने आते हैं। वहीं छड़ी जाहरदीवान मेले में महिलाओं और बच्चों ने भी खूब खरीदारी की। श्रद्धालुओं की भीड़ के चलते पुलिस ने भी चाक चौबंद इंतजाम किए।
दारानगर गंज में हरियाली तीज से भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की नवमी तक गोगा जाहरवीर उर्फ जाहरपीर की माढ़ी पर श्रद्धालु झंडी चढ़ाकर पूजन-अर्चन करते हैं। शनिवार को छड़ी जाहरदीवान मेले का तीसरा दिन रहा। फिर भी श्रद्धालुओं का सैलाब जस का तस बना हुआ है। शुक्रवार की रात दो बजे ही माढ़ी पर भक्तों की भीड़ लगनी शुरू हो गई थी, जोकि शनिवार की दोपहर दो बजे तक बनी रही। करीब दो लाख भक्तों के प्रसाद चढ़ाने का अनुमान लगाया गया। प्रसाद चढ़ाकर श्रद्धालुओं ने घर परिवार के लिए मंगल कामना की।
बिजनौर के रेहड़ में है गोगा जाहरवीर की ननसाल
राजस्थान में जन्मे गोगा जाहरवीर की ननसाल बिजनौर जिले के रेहड़ गांव में है। इनकी मां बाछल जिले में जिस जगह भी गई, वहां अब मेले लगते हैं। गर्भावस्था में काफी समय बाछल अपने मायके रेहड़ में रहीं। रेहड़ के राजा कुंवरपाल की बेटी बाछल और कांछल का विवाह राजस्थान के चुरु जिले के ददरेजा गांव में राजा जेवर सिंह व उनके भाई राजकुमार नेबर सिंह से हुआ। बताया जाता है कि बाछल ने पुत्र की प्राप्ति के लिए गुरु गोरखनाथ की लंबे समय तक पूजा की। गोरखनाथ ने उन्हेें झोली से गूगल नामक औषधि दी। औषधि के नाम पर उनकी संतान का नाम गोगा हो गया। रानी बाछल ने बेटे का नाम जाहरवीर रखा। बाछल ने जाहरवीर को वंश परपंरा के अनुसार शस्त्र कला सिखाई और विद्वान बनाया। जाहरवीर नीले घोड़े पर चढ़कर निकलते और मिल-जुलकर रहते। गुरु गोरखनाथ के ददरेजा आने पर जाहरवीर ने उनकी सेवा की और फिर उनकी जमात में निकल गए। देशभर में जहां जहां जाहरवीर गए, वहां उनकी माढ़ी बन गई। कहा जाता है कि जिस दंपती को संतान सुख नहीं मिलता, जाहरवीर गोगा जी की माढ़ी पर सच्चे मन से प्रार्थना करने पर मनकोमना पूरी हो जाती है।
गंगा में डुबकी लगाकर चढ़ाते थे प्रसाद
श्रद्धालु आकर पहले गंगा स्नान करते थे, हालांकि अब गंगा की धारा दो किलोमीटर दूर हो गई है। इस वजह से कम ही श्रद्धालु गंगा तक पहुंचते हैं। उधर स्नान के लिए जिला पंचायत की ओर से इस बार नलकूप की व्यवस्था की गई थी। स्नान के बाद ही माढ़ी पर प्रसाद या झंडी चढ़ाते हैं। यहां प्रसाद चढ़ाकर लगभग पांच किलोमीटर दूर नौलखा जाते हैं। नौलखा एक पुराना किला है। इसमें सैयद शुजात अली के मजार पर प्रसाद और झाड़ू चढ़ाते हैं।
बाबा गोरखनाथ ने भी यहीं लगाई थी पहली धूनी
यह भी कहा जाता है कि कि बाबा गोरखनाथ ने पहली धूनी गंज में ही लगाई थी। जाहरदीवान का पहला पड़ाव भी यही स्थान रहा। था। मुगल शासक की बेगम को सर्प ने डस लिया था। इसका उपचार बाबा जाहरदीवान ने किया था। इससे खुश होकर मुगल शासक ने यह रियासत बाबा जाहरदीवान को उपहार में दे दी थी।
जिला पंचायत कराती है मेला आयोजन
दशकों से छड़ी दीवान मेले का आयोजन जिला पंचायत कराती है। मुख्य अभियंता कपिल ने बताया कि 90 के दशक में यहां जिला पंचायत का मेला कार्यालय टीनशेड में चलता था, अब पक्का भवन बन चुका है। सामुदायिक भवन भी है। मुख्य अभियंता व्यवस्थाओं को संभलाने के लिए दिनभर मेले में डेरा डाले रहे। उधर सुरक्षा की व्यवस्थाओं को लेकर प्रभारी निरीक्षक रविंद्र वशिष्ठ पुलिस फोर्स के साथ मौजूद रहे।
बिजनौर के दारानगर गंज में छड़ी जाहर दीवान मेले में पूजा अर्चना करते श्रद्धालु।- फोटो : BIJNOR
बिजनौर के दारानगर गंज में छड़ी जाहर दीवान मेले में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़।- फोटो : BIJNOR