फजलगढ़ के गांव प्रेमपुरी में काले गेहूं की फसल को देखते किसान अमरीक सिंह।
- किसान अमरीक सिंह पिछले कई वर्षों से काले धान व गेहूं की खेती कर रहे
संवाद न्यूज एजेंसी
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अफजलगढ़। क्षेत्र के अनेक किसानों का रुख जैविक खेती की ओर बढ़ा है। किसान काला धान व काला गेहूं की भी बुवाई कर रहे हैं। लोगों के स्वास्थ्य और खानपान को देखते हुए क्षेत्र में काले गेहूं व धान की मांग बढ़ने लगी है।
गांव प्रेमपुरी निवासी किसान सरदार अमरीक सिंह ने काले गेहूं की बुवाई की है, बीते सीजन में उन्होंने धान की फसल की भी बुवाई की थी। जैविक के साथ सहफसली खेती कर द्वितीय स्थान प्राप्त करने वाले अमरीक सिंह जैविक फसलें उगाकर आम जनता को इसका लाभ पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। काला गेहूं सामान्य गेहूं के आकार का ही होता है। सामान्य गेहूं की तुलना में देखने में काला गेहूं जामुनी रंग का होता है। जिसे लगातार किसान अपना रहे हैं, तराई क्षेत्र में खेती के लिए यह फसल अच्छी मानी जाती है। काले गेहूं की किस्म को पंजाब के मोहाली स्थित नेशनल एग्रो फूड बायटेक्स्लाजी इंस्टीट्यूट में विकसित किया जाता है। बाजार में काले गेहूं का मूल्य सामान्य से कुछ अधिक है।
अमरीक सिंह ने बताया कि उन्होंने 10 बीघा काले गेहूं की बुवाई की है। काले गेहूं का बीज कई कंपनियों से मिल जाता है, इच्छुक किसान मोहाली से भी इस बीज को प्राप्त कर सकता है। काले गेहूं की खेती करने के लिए बुवाई का तरीका साधारण है। यह पांच नवंबर के आसपास बोया जाता है। पहली सिंचाई बुवाई के तीन हफ्ते बाद की जाती है। इसकी उपज साधारण गेहूं की अपेक्षा 10 प्रतिशत कम रहती है।
काले गेहूं में एक नेचुरल एंटी ऑक्सीडेंट एंटीबायोटिक प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जो हार्टअटैक, कैंसर, डायबिटीज जैसे रोगों को रोकने में सहायक है। जैविक विधि से पैदा करने पर गेहूं शुगर फ्री कहलाता है। इस संबंध में कृषि वैज्ञानिक केके सिंह का कहना है कि यह गेहूं साधारण गेहूं की किस्म की तरह ही है। इसका सरकार की ओर से या विभागीय स्तर पर कोई लेना देना नहीं है।