साहित्यकार दुष्यंत कुमार त्यागी की जयंती एक सितंबर पर विशेष
एजाज अहमद
नजीबाबाद (बिजनौर)। यहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं, खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा। हाथों में अंगारों के लिए सोच रहा था, कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए...। गागर में सागर भरने वाले उद्गार हर कोई व्यक्त नहीं कर सकता। हिंदी गजल के प्रणेता दुष्यंत कुमार ने अपनी काव्य रचनाओं में समाज के ऐसे ही दर्द को समेटा।
तहसील के गांव राजपुर नवादा में एक सितंबर 1933 को जमींदार परिवार में जन्मे दुष्यंत कुमार ने छोटी उम्र में ही अपनी साहित्यिक सोच को परदेसी उपनाम से लेखनी दी। दुष्यंत के बाल सखा गांव रघुनाथपुर निवासी 90 वर्षीय सत्य कुमार त्यागी का कहना है कि उनकी रचनाओं में आम आदमी के दर्द से लेकर सामाजिक परिवेश के हर उस पहलुओं का जिक्र है, जो इंसान की जिंदगी के आसपास रहते हैं।
बताते हैं कि दुष्यंत कुमार रचनाओं में हिंदी और उर्दू के उन मिश्रित शब्दों का प्रयोग करते थे, जो आम लोगों के दिलों में आसानी से उतर जाते थे। सिर्फ हंगामा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए..., एक चिंगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तों/ इस दीये में तेल से भीगी हुई बाती तो है..., पक गई आदतें बातों से सर होंगी नहीं/ कोई हंगामा करो ऐसे गुजर होंगी नहीं..., अब तो इस तालाब का पानी बदल दो ये कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं..., कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए/मैंने पूछा नाम तो बोला हिंदुस्तान हूं... दुष्यंत की ऐसी रचनाएं हैं, जिन्होंने सामाजिक ढांचे की खामियों को उजागर किया। साहित्य एवं काव्य सृजन को आमजन की वाणी बनाने वाले दुष्यंत कुमार ने 30 दिसंबर 1975 को 42 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कहा। (संवाद)
पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए... आज भी प्रासंगिक
सात्यिकार दुष्यंत कुमार की पंक्तियां मेरे गीत तुम्हारे पास सहारा पाने आएंगे, मेरे बाद तुम्हें मेरी याद दिलाने आएंगे... आज भी उनकी याद को तरो-ताजा बना रहीं हैं। उनकी चर्चित रचनाओं में हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए, अब कोई गंगा हिमालय से निकलनी चाहिए/ मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने सही/ हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए... दिलों की धड़कन बनी।
घर में बनाया था पुस्तकालय
नजीबाबाद। दुष्यंत कुमार ने अपने राजपुर नवादा स्थित घर के एक कमरे में पुस्तकालय बनाया था। उस समय गांव तक अखबार, पत्रिकाएं आदि नहीं पहुंचती थीं। वे स्वयं पत्र-पत्रिकाएं लाते थे और ग्रामीणों को भी पढ़वाते थे। गांव का पुस्तकालय कक्ष और दुष्यंत का आवास खंडहर में तब्दील है। दुष्यंत कुमार द्वारा अपने पिता भगवत सहाय और परिचितों को लिखीं चिट्ठियाें के अवशेष आज भी सुरक्षित हैं।