फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Bijnor News: मूर्ति निकलने पर अनवरपुर को मिली थी पहचान, अब हुआ चंडिका

विज्ञापन
कादराबाद के गांव अनवरपुर में खोदाई में निकली चंडी देवी की शीला। संवाद
विज्ञापन
-किंवदंतियों के अनुसार रामायण काल की बताई जाती है चंडी की मूर्ति
विज्ञापन

-गंगा जमुनी तहजीब की मिशाल कायम रखता है अनवरपुर चंडिका
-200 साल पहले ताजपुर रियासत ने कराया था मंदिर का निर्माण
-400 साल से अधिक पुराना है गांव का इतिहास

विनय भार्गव
कादराबाद। जिलेे की धरा धार्मिक दृष्टि से बेहद खास है। खोदाई में कहीं न कहीं पुराने परंपरा से जुड़े प्राचीन अवशेष निकलते रहते हैं। इन्हीं में से एक अफजलगढ़ ब्लॉक का अनवरपुर चंडिका गांव है। इस गांव को पहले अनवरपुर से जाना जाता है। मां चंडी की मूर्ति निकलने के बाद ही गांव को चंडिका की पहचान मिली।

अनवरपुर चंडिका गांव कादराबाद से करीब पांच किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ है। गांव की आबादी करीब तीन हजार के आसपास है। जहां सभी बिरादरी के लोग निवास करते हैं। अनवरपुर गांव का नाम अनवरपुर चंडिका पड़ने के पीछे अन्य कई किवदंती हैं।
विज्ञापन

बुजुर्गों का कहना है कि रामायण की कथा के अनुसार जब हनुमान राम-लक्ष्मण को अहिरावण से छुड़ाने पाताल लोक गए। तब उन्होंने वहां अहिरावण को मारने के बाद उसके मठ को भी हिला था। इसकी तीन ईंट उन्होंने पाताल लोक से धरती पर फेंकी थी। इसमें एक हरिद्वार, दूसरी काशीपुर और तीसरे अनवरपुर में गिरी थी। यहां टीले थे। करीब 400 वर्ष पहले टीलों को समतल करते समय चंडी मूर्ति के साथ ही अन्य शिलाएं निकलीं। इसके बाद गांव का नाम अनवरपुर चंडिका हो गया।

ताजपुर रियासत के कुंवर ने कराया था मंदिर का निर्माण
बुजुर्ग रामचरण का कहना है कि ताजपुर रियासत ने ही मठ के स्थान पर करीब 200 वर्ष पहले चंडी मंदिर का मठनुमा निर्माण कराया था। इसके समीप ही एक कुआं था। कुएं में जमींदार का एक बैल गिर गया था। जमींदार ने बैल के सही सलामत निकलनेे पर देवी मंदिर निर्माण व छत्र चढ़ाने की मन्नत मांगी थी। बैल के सलामत निकलने पर मंदिर का निर्माण कराकर चांदी छत्र चढ़ाया था।

ग्रामीण बुजुर्ग बुद्ध सिंह बताते हैं कि हरिद्वार चंडी मंदिर विश्व प्रशिद्ध है। काशीपुर में भी चेती मेला लगता है। वहीं अनवरपुर भी कभी बड़े-बड़े टीलों का गांव था। जिसे करीब 400 साल पहले समतल किया। जहां चंडी मूर्ति मिली। शिला का पूजा पाठ के बाद बनाकर स्थापित किया गया। जिससे गांव अनवरपुर से अनवरपुर चंडिका हो गया।


रामपाल सिंह का कहना है कि चंडिका वासी हर साल भादो माह की दोएज को हवन यज्ञ कर देवी की पूजा करते हैं। पूरे साल मनोकामना पूरी होने पर भंडारे हाेते हैं। साथ ही गांव की बेटी विवाह के बाद यहां पति के साथ प्रसाद चढ़ाने की भी प्रथा है।
विज्ञापन


मंदिर को दिया जा रहा भव्य रूप: डॉ. संदीप चौहान
डॉ. संदीप चौहान ने बताया कि मंदिर काे भव्य रूप दिया जा रहा है। टीले की करीब 10 फुट खुदाई कर समतल बनाकर निर्माण शुरू किया है। कार्य चलने के बाद वर्ष 2008 में भव्य शिव मंदिर की स्थापना हुई थी। जहां आज भी प्रतिवर्ष स्थापना दिवस पर भव्य आयोजन किया जाता हैं।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें