दयावंती पुंज डिग्री कॉलेज की ओर से रविवार को 21वीं सदी का भारत विचार और दृष्टिकोण पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वर्चुअल सेमिनार संपन्न हो गया। सेमिनार में देश-विदेश के विद्वानों ने अपनी राय रखी। कार्यक्रम का शुभारंभ सरस्वती वंदना से हुआ। अतिथियों का स्वागत कॉलेज की प्राचार्या डॉ. अंजलि सिंह ने किया। साहित्य चिंतक प्रो. सूरज पालीवाल ने कहा कि मौसम की तरह अब मनुष्यों के मूल्य भी बदलने लगे हैं। पहले दिन वक्ता प्रो. हरिकेश सिंह ने मानवीय चुनौतियों की ओर लोगों को आगाह करते हुए इससे बचने की सलाह दी। प्राच्य भाषा के विद्वान तथा पद्मश्री पुरस्कार से पुरस्कृत प्रो. रमाकांत शुक्ल ने भारतीय संस्कृति और गौरव-बोध पर कुशल व्याख्यान दिया। प्रो. शुक्ल भारतीय संस्कृत की अस्मिता और मानव-मूल्य पर विस्तृत रूप से प्रकाश डालते हुए वर्तमान समय में उसके औचित्य की प्रासंगिकता को रेखांकित किया। डॉ. पीएन सिंह ने भारतीय ज्ञान परंपरा और उसकी प्रासंगिकता पर बात रखते हुए आधुनिक शिक्षा और शिक्षण पद्धति का उल्लेख किया। डॉ. विदुषी शर्मा ने राष्ट्र निर्माण में स्वामी विवेकानंद जी के सिद्धांतों और विचारों का उल्लेख करते हुए उसकी वर्तमान प्रासंगिकता पर बल दिया। दूसरे दिन के कार्यक्रम में साहित्य चिंतक प्रो. सूरज पालीवाल ने कहा कि 21वीं सदी बदलाव की सदी है। राजनीति, समाज, व्यक्ति और धर्म-दर्शन में एक छद्म बदलाव दिखाई देता है। आज के समय में सिद्धांत का व्यवहार से कोई मतलब नहीं है। मौसम की तरह अब मनुष्यों के मूल्य भी बदलने लगे हैं। बेल्जियम से कपिल कुमार जी ने भारतीय राष्ट्र की अवधारणा और उसकी प्रासंगिकता पर अपने विचार रखे। उनका मानना था कि राष्ट्र की संरचना और उसका भविष्य उस देश के नीति-नियंताओं पर निर्भर करता है। देेश आज कई विषम परिस्थितियों से होकर गुजर रहा है, हमें इन परिस्थितियों से डटकर सामना करना होगा। हम यदि आज नहीं संभले तो अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसा देश और समाज देकर जाएंगे जहां मनुष्य तो होंगे लेकिन मनुष्यता गायब होगी। डॉ. अमिता वाजपेयी ने कहा कि आज के मनुष्यों ने पुराने मूल्यों की जगह कई नए मूल्यों को स्वीकार कर चुका है। जो मूल्य समय का साथ नहीं दे पाते उनका त्याग करना ही बुद्धिमानी है। संयोजक डॉ. अरविंद उपाध्याय एवं तकनीकी संयोजक डॉ. अनित दुबे को प्राचार्य ने बधाई दी।