ज्ञानपुर। मां त्याग है। तपस्या है। सेवा है। मां फूंक से ठंडा किया हुआ कलेवा है। मां अनुष्ठान है। साधना है। जीवन का हवन है.. यह कविता मां के त्याग व तपस्या से आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। कालीन नगरी में भी कई ऐसे लोग हैं, जिनकी सफलता के पीछे नेक व मजबूत इरादों वाली मां की मेहनत है। मां की तपस्या से सारी समस्याएं दूर हो गई और मुकाम मिल गया। किसी ने मजदूरी करके बेटे को डॉक्टर बनाया तो किसी ने पशुपालन और खेती के रास्ते पर चलकर अपने लाडले को संस्कारी और काबिल बनाया। सीतामढ़ी। क्षेत्र की मुन्नी देवी की उम्र इस समय 52 वर्ष है। 1992 में जिंदगी की गाड़ी बड़े ही आराम से चल रही थी। पति शेषधर उपाध्याय कोलकाता में रहते थे। इसी बीच एक बीमारी ने उन्हें मुन्नी से छीन लिया। उस समय मुन्नी के चार बच्चों की परवरिश करने की बड़ी जिम्मेदारी थी। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और कड़ी मेहनत करके अपने बच्चों को काबिल बनाया। दो बेटियों की शादी की और बेटों में एक रत्नेश उपाध्याय को पढ़ा लिखाकर परिषदीय स्कूल में शिक्षक बनाया। छोटे पुत्र नितेश उपाध्याय हैदराबाद में खुद का व्यवसाय करते हैं। संघर्ष की कहानी यदि किसी की सुननी हो तो अभोली ब्लाक के वीरमपुर निवासी हीरावती देवी की सुननी चाहिए। इनके संघर्ष की बदौलत ही इनके पुत्र बनवारी लाल बिंद डॉक्टर बने। बनवारी के नाम के आगे जो सम्मानजनक उपाधि जुड़ी है, उसके पीछे मां का त्याग है, मेहनत है और धैर्य भी है। वर्ष 2013 में जब हीरावती देवी के पति राजकुमार का निधन हुआ तो कुछ दिन के लिए परिवार टूट सा गया था। फिर हीरावती ने कड़ा संघर्ष किया। अपने खेत में मजदूर न लगाकर स्वयं मेहनत कीं, मजदूरी की और बच्चों का पाला-पोसा। उस समय बनवारी इंटर पास कर चुके थे। उन्हें बीएएमएस कराया और डॉक्टर बनाया। बनवारी कहते हैं कि आज मैं जो भी हूं, मां की वजह से हूं। इनके छोटे भाई विनोद हार्डवेयर की दुकान करते हैं।