नईबाजार के टीडीओ में कालीनों का अवलोकन करतीं स्वीडन की करीन टेरेंस
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भदोही। कोविड से हालात सुधरते ही भारतीय कालीन उद्योग की रौनक लौटने की प्रबल संभावना है। दो वर्षों से आयातकों-निर्यातकों का विदेश आवागमन बंद था। जैसे ही हालात बेहतर हो रहा है लोगों का आना-जाना शुरू होगा। इससे कालीनों की मांग में तेजी आने की उम्मीद है। अभी से मौका मिलने पर विदेशी कालीन खरीदार भदोही आ रहे हैं। नई दिल्ली में इंडिया कारपेट एक्सपो के बाद से आधा दर्जन से अधिक आयातकों ने जनपद के कालीन प्रतिष्ठानों का दौरा किया है।वर्ष 1980 और 1990 के दशक में भदोही की सड़कों पर कालीन आयातकों का दिखना आम होता था। धीरे-धीरे कालीन निर्यात के पटल पर पानीपत, नई दिल्ली, जयपुर आदि का नाम आने के बाद यह संख्या घटी जरूर है, लेकिन अभी भी आयातकों का भदोही आना-जाना बना हुआ है। कालीन निर्यातक बताते हैं कि दो वर्ष पूर्व कोविड से हालात सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं। आयातकों के आगमन पर तभी से ब्रेक लगा हुआ है। हालिया इंडिया कारपेट एक्सपो में आयातक भारत जरूर आएं लेकिन उनका मन कालीन प्रतिष्ठानों में कालीनों का अवलोकन करने से ही भरता है। यही कारण है कि एक्सपो के ठीक बाद कई आयातक भदोही आए। नई बाजार रोड टेपिच डी ओरिएंटा के वासिफ अंसारी कहते हैं कि कोविड से आवागमन पर लगा ब्रेक खुलते ही कालीन उद्योग की रौनक लौट सकती है। क्योंकि आयातक बहुतायत में आने लगेंगे। बताया कि उनके यहां गत दिनों स्वीडन की प्रमुख आयातक करीन टेरेंस भी सहयोगियों के साथ पहुंचीं। उनके साथ पिछले एक दशक से व्यापार हो रहा है। उन्होंने कई डिजाइनें और अलग-अलग प्रकार के कालीनों का अवलोकन किया। बताया कि वे वर्ष में कम से कम दो बार भारत का दौरा करती हैं। आयातकों को भदोही की धरती पर देख कर उम्मीद की किरण नजर आ जाती है।