सीतामढ़ी। वस्तु को भगवान को समर्पित कर जीव मुक्ति को प्राप्त होता है। जब जब धर्म पर विपदा आती है, तो उस विपदा को दूर करने के लिए भगवान का अवतार होता है। ये बातें कोनिया के भटगवां में श्रीराम कथा में चौथे दिन रविवार को काशी धर्मपीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी नारायणानन्द तीर्थ महाराज ने कहीं।
भगवान की अमृतमयी कथा सुनाते हुए कहा कि भगवान विष्णु के दो भक्त जय और विजय श्रापित होकर हाथी व मगरमच्छ के रूप में धरती पर उत्पन्न हुए थे। गोवर्धन कथा का वर्णन किया। कहा कृष्ण ने ब्रजवासियों को मूसलधार वर्षा से बचाने के लिए सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी उंगली पर उठाकर रखा और गोप-गोपिकाए उनकी छाया में सुखपूर्वक रहे। सातवें दिन भगवान ने गोवर्धन को नीचे रखा और हर वर्ष गोवर्धन पूजा करके अन्नकूट उत्सव मनाने की आज्ञा दी। तब से यह उत्सव अन्नकूट नाम से मनाया जाने लगा। संसार की कोई भी वस्तु भगवान से अलग नहीं है। शंकराचार्य ने बताया भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के घरों से माखन चोरी की। इस घटना के पीछे भी आध्यात्मिक रहस्य है। दूध का सार तत्व माखन है। उन्होंने गोपियों के घर से केवल माखन चुराया अर्थात सार तत्व को ग्रहण किया और असार को छोड़ दिया।