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सत्य के पुजारी प्रभु श्रीराम ने व्यतीत किया आदर्श का जीवन

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चौरी। क्षेत्र के भकोड़ा रेलवे फाटक के पास नारायण सेवा परिवार की ओर से चल रहे संगीतमय कथा के सातवें दिन मंगलवार को कथावाचक संत अजय भाई रघुराई महाराज ने कहा कि प्रभु श्रीराम सत्य के पुजारी थे और वह आदर्श जीवन व्यतीत करने में सफल हुए थे। कथा को सुनकर भक्तों ने जयकारा लगाया। संत ने जब राम वनवास पर बोलना शुरू किया तो पंडाल में उपस्थित महिला-पुरूष भक्तों की आंखे नम हो गईं। बताया कि राजा दशरथ श्रीराम का राज्याभिषेक करना चाहते थे, लेकिन मंथरा की कुटिलता से रानी कैकेई ने अपने दो वचन निभाने की बात राजा दशरथ से कही। इसमें एक वचन भरत को अयोध्या का सिंहासन दूसरा श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास था। महाराज दशरथ को कैकेई का वचन रास नहीं आया, लेकिन वह वचनबद्घ होने के लिए विवश थे। पिता के वचन को निभाने के लिए प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण, सीता के साथ वन को प्रस्थान करते ही अयोध्यावासी भी उनके पीछे चल दिए। जिन्हें समझाकर श्रीराम ने वापस किया और महाराज दशरथ वनवास को सहन न कर प्राण त्याग दिए। केवट प्रसंग पर महाराज ने कहा केवट के न आने पर श्रीराम विनय करते हैं तब केवट आकर कहता है कि प्रभु मैं आपकी पीड़ा समझ रहा हूं इसलिए मैं आपको नाव से पार नहीं कराऊंगा। आपके चरणों की रज से पत्थर की शिला नारी बन गई तो मेरी काठ की नाव यदि नारी बन गई तो यह गरीब दो नारियों का भार कैसे उठा सकेगा। अंत में भगवान राम के समझाने पर केवट ने सरयू नदी पार कराया। सभी प्रसंग बड़ों का आदर करने, कमजोर से वैर न रखने की सीख देता है इसका अनुसरण करना चाहिए। इस मौके पर संजीव दुबे, प्रेमबिहारी उपाध्याय, विभूति नारायण तिवारी, उत्तम दुबे, अतुलकांत पांडेय, आलोक दुबे, मोतीलाल मिश्रा, सौरभ दुबे, श्रीराम मिश्रा, राजू दुबे, बबलू दुबे, दीपक तिवारी आदि रहे।
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