सत्य, तप, दया और दान, ये धर्म के चार पर्याय हैं। सतयुग, त्रेता व द्वापर में सत्य, तप और दया क्षीण होते चले गए हैं। वर्तमान युग में दान ही बचा है। यही धर्म का स्वरूप है। हमें चाहिए कि अपने सामर्थ्य के अनुसार दान करते रहें। यह कहना है कथावाचक पं प्रमोद शास्त्री का। वह रैमलपुर गांव में साेमवार को भागवत कथा में प्रवचन दे रहे थे। कहा कि जरूरतमंदों की सहायता करना ही वास्तविक दान है, जो हमारी दी हुई वस्तु का सदुपयोग करें, वह सुपात्र है और जो हमारे दान का दुरुपयोग करे वह कुपात्र है। कुपात्र को दिया गया दान हमें नरक पहुंचाता है। हमें सदैव यह प्रयास करना चाहिए कि सुपात्र को ही दान करें। इस मौके पर संतोष, विनोद, विरेन्द्र पाठक, नरेंद्र, प्रमोद माैजूद रहे।