भदोही। दुराचार कभी भी फलीभूत नहीं होता, इसलिए हमें हमेशा सत्कर्म करते हुए सदाचार का आचरण करना चाहिए। इससे न सिर्फ परिवार में सुख समृद्धि आती है, बल्कि मन भी प्रसन्न रहता है। यह बातें नगर के रामलीला मैदान में बृहस्पतिवार से शुरू हुए श्रीमद् भागवत महापुराण कथा में पहले दिन कथा वाचक बसंत कुमार शुक्ला ने कही। उन्होंने पहले दिन गोकर्ण और धुंधकारी की कथा का रसपान कराया।
बताया कि दो पुत्रों में गोकर्ण ज्ञानी व पंडित निकला किंतु धुंधकारी दुष्ट व दुराचारी निकल गया। उसने अपने जीवन में चोरी करना शुरू करने के साथ-साथ दूसरों को कष्ट पहुंचाना शुरू कर दिया। अंत में उसने अपने पिता की सारी संपत्ति नष्ट कर दी। जिससे दुखी होकर पिता आत्मदेव घर छोड़कर वन चले गए और प्रभु भक्ति में लीन हो गए। बताया कि उन्होंने धर्म कथाएं सुननी शुरू कर दी, जबकि मां धुंधली घर पर ही थी। एक दिन धुंधकारी ने मां को भी मारा पीटा और प्रश्न किया कि सारा धन कहां छिपा के रखा गया है। पुत्र से आजिज आकर मां कुएं में कूद गई। एक पौराणिक कथा के अनुसार महाराज ने बताया कि तुंगभद्रा नदी के तट आत्मदेव नामक ब्राह्मण रहता था, जो बड़ा ही विद्वान था। आत्मदेव को सबसे बड़ा दुख यह था कि उसके कोई संतान नहीं थी जब जंगल में गया तो उसे एक साधु मिले। जिनसे अपनी पीड़ा बताई। जिस पर साधु ने उसे एक फल देकर पत्नी धुंधली को खिलाने के लिए कहा, लेकिन उसकी पत्नी ने फल को खुद न खाकर गाय को खिला दिया। जिसके कुछ समय बाद गाय ने एक बच्चे को जन्म दिया। जिसका रूप मनुष्य जैसा था। उसका नाम गोकर्ण पड़ा। धुंधली को उसकी बहन ने अपना एक पुत्र दे दिया, जिसका नाम धुंधकारी रखा गया था।