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Bhadohi News: रोज 10 मरीजों को गुमराह कर निजी अस्पताल भेज देते हैं बिचौलिये

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ज्ञानपुर। जिले के सरकारी अस्पताल रेफरल सेंटर बन गए हैं। इनमें बिचौलिये खास भूमिका निभा रहे हैं। कमीशनखोरी के खेल में अस्पताल से मरीज को वाराणसी बीएचयू या प्रयागराज रेफर कर दिया जाता है। संविदा, आउटसोर्सिंग कर्मचारियों और डॉक्टरों की संलिप्तता से खेल चल रहा है। जिले के सरकारी अस्पतालों से हर रोज औसतन 55 से 60 मरीज बीएचयू व प्रयागराज के सरकारी अस्पताल में रेफर होते हैं लेकिन इनमें से 8-10 मरीजों को बिचौलिये बीच में ही आयुष्मान या सस्ते इलाज का झांसा देकर निजी अस्पतालों में पहुंचा देते हैं। जिला अस्पताल, भदोही एमबीएस, छह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर रोजाना 4500 से 5000 की ओपीडी होती है। इसके अलावा 150 से 200 की ओपीडी होती है। सरकारी अस्पतालों में इमरजेंसी से लेकर ओपीडी भवन तक बिचौलियों का जाल फैला है। अस्पताल में जो डॉक्टर संविदा पर काम कर रहे हैं, उनके आदमी अस्पताल में घूमते रहते हैं। यही हाल पीएचसी का है। 25 स्वास्थ्य केंद्रों से रोजाना आठ से 10 मरीजों को निजी अस्पताल पर डायवर्ट करते हैं। यह सब अस्पताल के कर्मचारियों के सामने होता है। जिला अस्पताल, सीएचसी पर सुबह से लेकर शाम तक ऐसे दर्जनों लोग घूमते हैं, जिनका वहां कोई काम नहीं होता। जिला अस्पताल में संविदा के कुछ डॉक्टर बिचौलियों को अपनी केबिन में बैठाते हैं। नाम न छापने की शर्त पर अस्पताल के एक कर्मचारी ने बताया कि निजी अस्पताल में 10 हजार का बिल बनने पर बिचौलिये को दो हजार रुपये कमीशन मिलता है। बताया कि हर दस हजार पर दो हजार रुपये तय है। हालांकि उपचार भी बेहतर ढंग से किया जाता है। ऐसे लोगों पर नकेल कसने के लिए अस्पताल प्रशासन समय-समय पर अभियान चलाकर कार्रवाई करता है। कुछ ही दिन बाद बिचौलिये पुन: सक्रिय हो जाते हैं। गंभीर मरीज को प्राथमिक उपचार के बाद डॉक्टर मरीज को बीएचयू, ट्राॅमा सेंटर, मिर्जापुर मंडल अस्पताल या स्वरूपरानी अस्पताल प्रयागराज रेफर कर देते हैं। मरीज इमरजेंसी से बाहर निकलते हैं। एंबुलेंस को फोन घुमाते हैं। इसी बीच बिचौलिये मरीज के परिजन के पास पहुंच जाते हैं। भइया नमस्ते, कैसे है, क्या हुआ पूछते हैं। गंभीर केस है। इसे त्वरित उपचार करवाएं। भदोही, गोपीगंज के निजी अस्पताल में लेकर जाएं। वहां पहचान वाले लोग हैं, दिक्कत नहीं होगी। इससे परिजनों को बल मिलता है। दूसरी तरफ एंबुलेंसकर्मी परिजन के मोबाइल लेकर ओटीपी रिसीव कर लेते हैं कि एंबुलेंस बुक को गई है। रेफरल सेंटर तक मरीज जाए या न जाए, एबुलेंसकर्मी का काम हो जाता है। अस्पताल आने वाले मरीज, तीमारदारों की निगरानी के लिए जिला अस्पताल में 37 कैमरा लगाया गया है। सभी सीसीटीवी कैमरा को मात देते हुए दलाल मरीज के डायवर्ट कर देते हैं। अस्पताल प्रशासन से लेकर हर एक डॉक्टर को मालूम है।
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