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पुलिस डायरी में केस, न्यायालय में नहीं हो रहा पेश

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मुकदमा दर्ज होने के बाद पीड़ित को न्याय की आस रहती है। इसके लिए सरकार ने भी आदेश जारी कर रखा है। नियम है कि 90 दिनों के भीतर मुकदमे की विवेचना पूरी कर केस डायरी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जाए, लेकिन यहां विवेचकों की मनमानी मानी जाए या फिर पहुंचवालों का दखल। 264 ऐसे मुकदमें हैं जिनकी विवेचना अटकी हुई है। जिले में नौ थाने हैं और 16 लाख से अधिक की आबादी है। हर माह औसतन सभी थानों में 30 से 35 मुकदमे होते हैं। जिसमें दहेज हत्या, हत्या, छिनैती, हत्या के प्रयास सहित अन्य मुकदमें शामिल रहते हैं। इनकी विवेचना उप निरीक्षक को दी जाती है। अहम बात ये है कि दहेज उत्पीड़न और एससीएसटी एक्ट के साथ ही कई अन्य मुकदमों की विवेचना क्षेत्राधिकारी और क्राइम ब्रांच करती है। थाना पुलिस की उदासीनता के कारण अधिकतर मुकदमे लंबित रह जाते हैं। पुलिस के आंकड़ों पर गौर करें तो 264 मुकदमों की विवेचना लंबित है। इसमें 175 मुकदमे तीन माह के अंदर जबकि 15 मुकदमे तीन से छह माह के मध्य के हैं। छह से दो साल के 32 और दो से पांच साल के तीन मुकदमों की विवेचना लंबित है।
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