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प्राकृतिक रंगों के प्रयोग से कम हुआ जल प्रदूषण का खतरा

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ज्ञानपुर। नहरों, तालाबों और सरोवरों में दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन के बाद उन्हें राम भरोसे छोड़ दिया गया है। प्रशासन ने सफाई के कोई इंतजाम नहीं किए, जिससे मूर्तियों का मलबा बजबजाने और रासायनिक रंगों के कारण जलाशय प्रदूषण हो रहे हैं। इससे पर्यावरण पर असर पड़ना पड़ने के साथ जलीय जीवों का जीवन भी खतरे में पड़ गया है। दुर्गा प्रतिमा बनाने में रासायनिक रंगों के प्रयोग में कमी आने से जल प्रदूषण का खतरा भी कम हो रहा है। हालांकि जल प्रदूषण को रोकने के लिए यह पर्याप्त नहीं है। पानी में मूर्ति के मलबे के सड़ने और रंग धूलने से पानी के वास्तविक स्वरूप पर इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है। इससे जलीय जीवों के अस्तित्व के साथ ही पानी की निर्मलता भी दूषित हो रही है। गोपीगंज में मूर्ति बनाने वाले किशन कुमार ने बताया कि वह मूर्ति में प्रयोग के लिए कच्चे रंग का प्रयोग करते हैं। उसे बनारस और कोलकाता से मंगाया जाता है। यह रंग प्रदूषण के लिहाज से नुकसानदेय नहीं माना जाता है। पहले वह रासायनिक रंगों का प्रयोग कर वह मूर्ति को बनाते थे। लेकिन, इसके दुष्प्रभाव के बारे में जानकारी के बाद वह बनारस और कोलकाता से प्राकृतिक रंग मंगाते हैं। पर्यावरणविद डॉ. कमाल अहमद सिद्दीकी ने बताया कि मूूर्ति में प्रयोग होने वाले रंगों से जलीय जीव पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। रासायनिक रंगों के प्रयोग से न के बराबर जलीय जीव पर इसका प्रभाव पड़ता है। इसके प्रति जागरूकता बढ़ने के कारण मूूर्तिकार अब रासायनिक रंगों की अपेक्षा प्राकृतिक रंगों का ज्यादा प्रयोग करने लगे हैं, जिससे मूर्ति विसर्जन से जलीय जीवों का कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है। हालांकि जगह जगह मूर्ति के मलबे रुकने से जल का प्रवाह प्रभावित होता है। इससे बचने के लिए विसर्जन के बाद प्रशासन को तालाबों और नहरों की सफाई करानी चाहिए। गौरतलब है कि जिले में 450 प्रतिमाओं को एक दर्जन से अधिक जलाशयों पर विसर्जित किया गया था।
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