गोपीगंज। नगर क्षेत्र में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन कथावाचक शंकराचारी वैरागी महाराज ने कहा कि मन रुपी मंदिर में सफाई न होने पर भी खानपान और साधना के लिए निर्मल मन की आवश्यकता पड़ती है। बिना आध्यात्म के जीवन का संपूर्ण समय अधूरा रह जाता है। अध्यात्म ठाकुर जी के सानिध्य में रहकर विकास करती है। जैसे बीरबल के छह वर्ष की पुत्री ने राजा अकबर को सिंहासन से नीचे उतार दिया। निर्मल मन और निर्मल भक्ति ही सुदामा को दरिद्र ब्राह्मण से सुदामापुरी का राजा बना दिया। पत्नी रुकमणी के लाख समझाने पर पर भी श्रीाृष्ण ने सुदामा के दिव्य रुपी चावल को खाया। कहा कि सुदामा प्रभु श्रीकृष्ण के परम मित्र थे। बालसखा से मिलने के लिए वह नदी तट पहुंचे। जहां श्रीकृष्ण ने केवट का रुप धारण कर नाव से पार कराया। सुदामा का नाम सुनते ही श्रीकृष्ण भगवान दौड़ पड़े और पितांबर के नीचे गिर पड़े तो दरबारी अचंभित हो उठे। रुक्मिणी कुछ समझ पाती कि वह सुदामों को अपनी बाहों में भर लिया। एक-दूसरे को पास पाकर दोनों मित्र रोने लगे। उसी दिन से श्रीकृष्ण ने सुदामा के सुखमय जीवन का अहसास करा दिया था।