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वरुणा का अस्तित्व संकट में

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ज्ञानपुर। जीवनदायिनी वरुणा का अस्तित्व संकट में है। मनमाना अतिक्रमण, खनन और कालीन कारखानों के जहरीले अपशिष्ट से नदी प्राकृतिक सौंदर्य खोने के साथ ही सिकुड़कर गंदे नाले में तब्दील होती जा रही है। आठ से नौ महीने तक पानी का अभाव झेलने वाली नदी पर ईंट भट्ठा संचालकों की नजर गड़ गई है। यही वजह है कि नदी के किनारों पर जहां मनमाने ढंग से ईंट भट्ठों की आड़ में अतिक्रमण किया जा रहा है, वहीं डाइंग प्लांटों का जहरीला पानी बहाकर इसके अस्तित्व से खिलवाड़ किया जा रहा है। इलाहाबाद के फूलपुर कारीगांव ताल से निकलकर जौनपुर और भदोही के सैकड़ों गांवों को जीवन देने वाली वरुणा जिले में अंतिम सांसें गिन रही है। नदी पर अवैध कब्जे किए जा रहे हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों को दरकिनार कर चल रहे ईंट भट्ठों के लिए ईंटों पथाई की आड़ में नदी क्षेत्र में अतिक्रमण किया जा रहा है। नई बाजार-सुरेरी मार्ग पर संचालित एक ईंट भट्ठे के अतिक्रमण की वजह से वरुणा नाले का रूप ले चुकी है। भदोही कोतवाली क्षेत्र के परगासपुर गांव में नदी के कछार में तीन ईंट भट्ठे संचालित हो रहे हैं। यहां मनमाने खनन के चलते नदी का अस्तित्व संकट में पड़ गया है। इसी तरह चौरी-मलेथू मार्ग पर नदी से बमुश्किल आठ से 10 मीटर की दूरी पर तीन ईंट भट्ठे हैं। वहीं, कालीन व्यवसायियों के डाइंग प्लांट का अपशिष्ट भी नदी में धड़ल्ले से गिराया जाता है। कालीन नगरी में बड़ी संख्या में डाइंग प्लांट हैं, जिनका जहरीला पानी नदी में घुलता है। उल्लेखनीय है कि दुर्गागंज क्षेत्र से जिले में प्रवेश करने वाली वरुणा के किनारे करीब सौ गांव स्थित हैं, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इससे लाभान्वित होते हैं। इसके बावजूद संकट के दौर से गुजर रही नदी की पीड़ा को समझने वाला कोई नहीं है। जिलाधिकारी राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि नदी पर अतिक्रमण गंभीर मसला है। इसकी जांच करवाकर कड़ी कार्रवाई करेंगे।
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