भदोही। जीएसटी काउंसिल की 9 सितंबर को हैदराबाद की बैठक में दस्तकारों के लिए हुई घोषणा का मझोले कालीन व्यवसाईयों के हर वर्ग ने स्वागत किया है। उद्योग में 20 लाख रुपये सालाना कारोबार से नीचे के व्यवसाईयों की संख्या अधिक है। ऐसे व्यवसाईयों को बगैर जीएसटी पंजीकरण के अंतर्राज्यीय व्यवसाय करने की छूट दिए जाने को अच्छा निर्णय बताया जा रहा है। बीते एक जुलाई से पूरे देश में एक साथ लागू हुई जीएसटी की पेचीदगियों से कालीन उद्योग से जुड़ा हर वर्ग परेशान दिख रहा था। सबसे अधिक दुश्वारी बुनकरों और मजदूरों पर थोपे गए 18 प्रतिशत जीएसटी (जो अब 5 प्रतिशत हो चुका है) को लेकर था। इसके अलावा सबसे बड़ी समस्या यह थी कि अपंजीकृत कारोबारी अंतर्राज्यीय कारोबार नहीं कर सकते थे। कालीन उत्पादकों का कहना था कि सरकार रोजगार के अवसरों को छीन रही है। भारी मात्रा में कालीन बिहार, बंगाल, मध्यप्रदेश राज्यों में बनता है। इतना ही नहीं मझोले कांट्रैक्टर नई दिल्ली कश्मीर, पानीपत, जयपुर के निर्यातकों को अपना माल बेच लेते थे। अखिल भारतीय कालीन निर्माता संघ (एकमा) के मानद सचिव पियूष बरनवाल ने कहा कि कुल मिलाकर परिक्षेत्र का व्यवसाय खत्म होने की ओर बढ़ रहा था। उन्होंने बताया कि शनिवार को हैदराबाद की बैठक में 20 लाख रुपये सालाना कारोबारियों को बगैर जीएसटी पंजीकरण अंतर्राज्यीय माल भेजने और मंगाने की छूट दिए जाने से भारी संख्या में लोगों को सहूलियत होगी। उन्होंने कहा कि बीते दिनों एकमा के बैनर तले प्रतिनिधिमंडल ने वित्त मंत्री से मिल कर अपनी जो तीन मांगे रखी थी उसमें से दो मांगे पूरी हो चुकी है। इससे स्थितियां बदलेंगी।