बस्ती। उफ! ये गंदगी...। इधर उधर कचरे का ढेर लगे हैं। नालियां बजबजा रही हैं। सड़ा गला सब्जी और फल का अपशिष्ट कीचड़ के साथ चौतरफा पसरा हुआ है। जलभराव का संकट तो पूछिए मत। हल्की बारिश में ही प्रतिष्ठानों के सामने सड़क पर पानी भर जा रहा है। ईंट बिछाकर एक शेड से दूसरे शेड में जाना पड़ रहा है। आम खास कोई भी हो, हर कदम पर दुश्वारी है।
यहां पहुंचें तो गंदगी और कीचड़ से सने पैर लेकर लौटेंगे। कहीं फिसलकर गिर गए तो कपड़े भी खराब हो जाएंगे।
जी हां, हर रोज करोड़ों के कारोबार के बीच सड़ांध और बदबू से जिंदगी जूझ रही है। यह सेहत के लिए भी खतरा है। मगर क्या करें, सबकी मजबूरी पेट की है। व्यापारी न अपना कारोबार छोड़ सकते हैं और मजदूर न अपना मेहनत वाला काम। यह हाल है हाईवे किनारे अमौली स्थित नवीन सब्जी मंडी परिसर का।
यह जनपद की सबसे बड़ी मंडी है। यहां सब्जी, फल एवं गल्ले का थोक कारोबार होता है। इस मंडी में प्रवेश के तीन गेट हैं। हड़िया ओवरब्रिज की सर्विस लेन पर स्थित गेट से सब्जी मंडी में प्रवेश मिलता है। सर्वाधिक दुश्वारी इसी प्रवेश मार्ग पर है। यहां सब्जी कारोबारियों के लिए चार ब्लॉक में शेड बने हैं। तीन तरफ से सड़क है। गेट के अंदर दाखिल होते ही सब्जियों से निकलने वाले अपशिष्टों का जगह-जगह ढेर लगा है।
कीचड़ और गंदगी तीनों सड़कों पर है। शेड के बाहर बनी नालियां खुली छोड़ी गई हैं। यह पानी का बहाव नहीं हो रहा है। नालियां बजबजा रही हैं। गंदा पानी खुले में बह रहा है। बारिश के दौरान एक शेड से दूसरे शेड में जाने लायक नहीं रहता है। धूप होने पर सड़ांध और बदबू उठ रही है। इस बदइंतजामी के बीच कारोबारी दिन भर बैठे हुए हैं। गंदगी और कीचड़ के बीच मजदूर तबका सब्जियों से लदे छोटे-बड़े वाहनों की लोडिंग-अनलोडिंग में व्यस्त हैं। खरीदार भी आजकल इन्हीं दुश्वारियों से दो चार हो रहे हैं।
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फल मंडी में राह चलना दूभर
मंडी के दूसरे भाग में फल कारोबार का अड्डा है। यहां पहुंचने के लिए दूसरे गेट से दाखिल होना सुविधाजनक है। दूसरा प्रवेश मार्ग तो कुछ हद तक ठीक है, लेकिन फल मंडी के करीब आते ही दुश्वारियां सामने आ जाती है। यहां सड़े गले फलों का अपशिष्ट सड़कों पर ही पसरा हुआ है। जलभराव की समस्या हर समय रहती है। नालियां चोक कर गई है। कारोबारी गंदगी और सड़ांध के बीच पूरे दिन धंधे में व्यस्त है।
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गल्ला मंडी में भी सुविधाएं नहीं
मंडी के तीसरे सेक्टर में गल्ला मंडी संचालित की जाती है। यहां भी समस्याओं का अंबार है। सड़कें क्षतिग्रस्त हो गई है। खुले मैदान में गंदा पानी पसरा हुआ है। यहां आने वाले किसान और व्यापारी दुर्गंध और गंदगी के बीच अपना काम निपटा रहे हैं।
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पेयजल और शौचालय की व्यवस्था नहीं
मंडी में कहीं पर भी आमजन एवं कारोबारियों के लिए पेयजल और शौचालय की व्यवस्था नहीं है। फल मंडी के मार्ग के किनारे बनाए गए सार्वजनिक शौचालय देखरेख के अभाव में वर्षों से बंद पड़े हैं। इंडिया मार्क -2 नल खराब हो कर अवशेष में तब्दील हो गया है। वाटर कूलर भी वर्षों से बंद पड़ा है। प्यास बुझाने के लिए लोग चाय के ठेले का सहारा लेते हैं। कारोबारी खुद के बजट से पीने के लिए बंद बोतल पानी मंगा रहे हैं। परिसर में इधर उधर खुले में लोगों को शौच करना पड़ रहा है।
नहीं बन सकी अपशिष्ट प्रबंधन की व्यवस्था
मंडी में प्रतिदिन करोड़ोें का कारोबार होने के बाद भी जरूरी सुविधाएं नहीं पहुंचाई जा सकी। नियमित साफ-सफाई छोड़िए यहां बड़े पैमाने पर निकलने वाले अपशिष्टों के प्रबंधन की व्यवस्था नहीं है। जबकि कारोबारियों से प्रतिमाह किराएदारी के नाम पर लाखों रुपये राजस्व वसूल किया जाता है। प्रतिदिन बैठकी अलग से देनी पड़ती है। वाहनों की आवाजाही पर मंडी शुल्क भी वसूल किया जाता है। बावजूद इसके नाली, पानी, सड़क, शौचालय, सफाई की व्यवस्था नहीं है।
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सेहत पर ध्यान दें तो कैसे मिटेगी भूख
मंडी में प्रतिदिन हाड़तोड़ मेहनत करने वाले मजदूरों का रोना अलग है। अमोली गांव के पंचम ने कहा कि सेहत के लिए यहां की गंदगी और कीचड़ से परहेज करें तो दो जून की भूख कहां से मिटेगी। दिन भर मेहनत करने के बाद ही परिवार का भरण पोषण हो पाता है। ठेला चालक रहमान ने कहा कि साहब इंसान तो हम भी साहब। अच्छा तो नहीं लगता, लेकिन क्या करें मजबूरी है। घुटने भर पानी और कीचड़ के बीच रोज सब्जी और फल ढोकर यहां से ले जाते हैं। वहीं बुद्धू, काशी, चितरंजन आदि मजदूरों ने कहा कि प्रशासन को ध्यान देना चाहिए। यदा कदा अधिकारी आते हैं, लेकिन समस्याओं से मुंह मोड़कर चले जाते हैं।
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हम लोगों की व्यथा को सुनने वाला कोई नहीं है। साल के 12 महीने मंडी परिसर गंदगी से भरा रहता है। बजबजाती नालियों के सामने बैठकर हमें कारोबार करना पड़ रहा है।
-जितेंद्र जायसवाल, व्यापारी।
मंडी परिसर के नियमित सफाई की कोई व्यवस्था नहीं है। हम लोग खुद अपने दुकानों के सामने झाड़ू लगा लेते हैं। यहां सेहत बिगड़ने का खतरा हर समय रहता है, लेकिन कोई ध्यान नहीं देता।
-गुलाब, व्यापारी।
मंडी में अधिकारी आते हैं मगर वह केवल छापेमारी का उद्देश्य लिए होते हैं। हम लोगों की समस्या से उन्हें कोई लेना देना नहीं होता है। जुर्माना आदि कार्रवाई के बाद इन्हीं कचरों को कुचलते हुए वह भी निकल देते हैं।
-मुशेलाल, व्यापारी।
विधानसभा और लोकसभा चुनाव के समय यहां अधिकारियों का आना जाना अधिक रहता है। मगर गल्ला मंडी की तरफ से ही वे लौट जाते हैं। यहां की दुश्वारी से जिले के आला अधिकारी अवगत नहीं होते हैं।
-प्रदीप, व्यापारी।
मंडी की सफाई समय-समय पर कराई जाती है। नालियों और सड़कों के मरम्मत के लिए प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेजे गए हैं। बजट मिलने के बाद भी कार्य हो पाएगा।
-महेंद्र कुमार गुप्ता, मंडी सचिव।