सुख-दुख तो मन की कल्पना है। सद्गुणों से जो संपन्न हैं, वही ईश्वर हैं। मनुष्य का शरीर ही वह कुरुक्षेत्र है जहां निवृत्ति और प्रवृति का युद्ध होता रहता है। इस शरीर रूपी रथ को जो कृष्ण के हाथों में सौंप देता है उसे ही विजय श्री मिलती है।
यह विचार डॉ. राम सजीवन शास्त्री ने हर्रैया के समौड़ी गांव में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा के छठें दिन व्यास पीठ से व्यक्त किया। कथा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि कंस को यह पता था कि उसका वध श्री कृष्ण के हाथों ही होना है। इसलिए उसने बाल्यावस्था में ही श्रीकृष्ण को बार-बार मरवाने का प्रयास किया। उसका हर प्रयास भगवान के सामने असफल साबित हुआ। अंत में श्री कृष्ण ने अपने मामा कंस का वध कर मथुरा नगरी को कंस के अत्याचारों से मुक्ति दिलाई। कंस वध के बाद श्री कृष्ण ने अपने माता-पिता को कारागार से मुक्त कराया।
उन्होंने श्री कृष्ण और माता रूक्मणी के विवाह की कथा भी सुनाई। कहा कि रुक्मणी विदर्भ देश के राजा भीष्म की पुत्री और साक्षात लक्ष्मी की अवतार थीं। राजा भीष्म ने लक्ष्मी को पुत्री के रूप में प्राप्त किया। धन, पद, प्रतिष्ठा के रूप में लक्ष्मी सभी को प्राप्त हैं। महत्वपूर्ण यह है कि अपनी लक्ष्मी को राजा भीष्म की तरह नारायण से जोड़ता कौन हैं। रावण, कंस, दुर्योधन जैसे लोगों ने अपनी लक्ष्मी को मांस, मदिरा, जुआ, दुराचार जैसे कुकर्मों से जोड़ा। जिसके कारण उनका समूल नाश हो गया।
इस मौके पर राजमणि पांडेय, राकेश तिवारी, प्रमोद सिंह, देवेंद्र नाथ मिश्र, धीरेंद्र नाथ मिश्र, श्रीनाथ मिश्र आदि मौजूद रहे।