- किराए पर आ रहे डॉक्टर, ग्रीन पर्दे की आड़ में कमरों में हो रही सर्जरी
- अधिकारियों के नोटिस का भी असर नहीं, बंद नहीं हो रहे ऐसे अस्पताल
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। इलाज भी अब धंधा बन गया है। न कोई मानक न कोई डिग्री कहीं लोग डॉक्टर बन गए हैं तो कहीं बगैर पंजीयन के ही अस्पताल संचालित कर रहे हैं। एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, खून जांच तक में भी डिग्री धारकों से आगे होकर धंधेबाज कदमताल कर रहे हैं। विभाग इस धंधे पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। मरीज जान खतरे में डालकर ऐसे अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं।
मेडिकल के क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवा के नाम लंबा झोल है। प्रतिष्ठित नर्सिंग होम में कुछ दिनों तक डॉक्टर और फार्मासिस्ट के सहायक के तौर काम करने वालों की इलाज करने कर रहे हैं। इस चक्कर में लोग दुकान और घर तक को मेडिकल क्लिनिक के साथ अस्पताल का स्वरूप दे रहे हैं। कुछ दिनों तक मरीज बटोर कर कमाई करने के बाद यह धंधेबाज पंजीयन कराने के लिए जोर लगा रहे हैं। विभाग भी इन्हें अस्पताल संचालक के रूप में स्वीकार कर रहा है।
पिछले माह सीएमओ डॉ. आरएस दुबे के निरीक्षण में इस तरह के कई मामले सामनेे आए हैं। 50 से अधिक अस्पतालों के निरीक्षण करीब 30 अस्पताल जुगाड़ वाले पाए गए हैं। इनमें एक दर्जन तो ऐसे अस्पताल मिले जो बिना पंजीकरण और मानक पूरा किए ही संचालित किए जा रहे हैं। ऐसे अस्पताल भी पाए गए जहां पंजीकरण में उल्लेखित डॉक्टर की मौजूदगी ही नहीं पाई गई है। स्पष्ट है कि यहां अयोग्य लोग मरीजों का इलाज कर रहे हैं।
इन अस्पतालों के खिलाफ अभी कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आ सकी है। विभाग सिर्फ नोटिस जारी करने तक ही सीमित है। जिससे मेडिकल क्षेत्र के इन धंधेबाजों के हौसलों में कोई कमी नहीं है। उधर जांच हुई इधर एक से दो दिन बाद फिर अस्पताल खोलकर कारोबार शुरू कर दिया जा रहा है।
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बिना डॉक्टर के हो रहा अल्ट्रासाउंड और एक्स-रे
कारोबार बढ़ते ही छद्दम किस्म के अस्पतालों में जांच की भी व्यवस्था बनाई जा रही है। मशीनोें की उपलब्धता सुनिश्चित कर जांच अयोग्य लोग कर रहे हैं। ऐसे सेंटर भी कई बार पकड़ में आए हैं। जनवरी में तत्कालीन एसडीएम ने जिला महिला चिकित्सालय के सामने सात अल्ट्रासाउंड सेंटरों को योग्य डॉक्टर की मौजूदगी न मिलने से सील करा दिया गया था। ओपेके चिकित्सालय कैली के सामने भी पैथोलॉजी और अल्ट्रासाउंड मिलाकर चार सेंटरों पर प्रशासन ने ताला जड़ा था।
इनमें से अधिकांश सेंटर फिर से संचालित होने लगे। इसी तरह जुलाई माह में सीएमओ ने भी तीन निजी नर्सिंग होम में अल्ट्रासाउंड मशीन बिना डॉक्टर के संचालित होते पकड़ा है। यह तो बानगी मात्र जिले के अधिकांश निजी नर्सिंग होम में अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे और खून जांच की व्यवस्था बिना चिकित्सक के संचालित हो रही है। कार्रवाई से बचने के लिए कुछ संचालकों ने जांच सेंटरों का पंजीकरण जरूर करवाया है लेकिन संबंधित चिकित्सक मौके पर मौजूद नहीं मिलते हैं।
पंजीकरण में डिग्री बीएमएस की, कर रहे सर्जरी
जिले के अधिकांश निजी अस्पतालों में छोटे-बड़े ऑपरेशन तक की व्यवस्था संचालित की जा रही है। इसमें धंधेबाज से लेकर प्रतिष्ठित अस्पतालों में भी लंबा झोल है। एमबीबीएस, एमडी डिग्री धारक चिकित्सकों के अस्पताल में गर्भवती महिलाओं के अलावा पथरी, हड्डी, गाल ब्लेडर, हाइड्रोसील, हार्निया आदि की सर्जरी कराई जा रही है जबकि इन मामलों में ऑपरेशन करने के लिए विशेषज्ञ सर्जन का उल्लेख पंजीकरण में नहीं रहता है। अस्पताल संचालक ऐसे मरीजों के भर्ती करने के बाद अस्थाई तौर पर ऐसे चिकित्सकों को सर्जरी के लिए बुला लेते हैं। इसके बदले में उन्हें रकम दी जाती है। इसी आधार पर छोटे स्तर के निजी अस्पतालों में भी मरीजोें का ऑपरेशन कराया जा रहा है। विभाग यह सब जानते हुए भी कार्रवाई से परहेज करता है।
स्थायी तौर पर नहीं है बेहोशी के डॉक्टर
बड़े-बड़े प्रतिष्ठित निजी नर्सिंग होम हो या घर दुकान में चलाए जा रहे अस्पताल हर जगह ऑपरेशन कराने वाले मरीजों को भर्ती कर उपचार किया जा रहा है लेकिन अधिकांश निजी अस्पतालों में बेहोशी के डॉक्टर स्थायी रूप से नहीं है। इसकी व्यवस्था अस्थायी तौर पर की जाती है, जबकि बेहोशी के डॉक्टर के बगैर ऑपरेशन संभव नहीं होेता है। सर्जरी कराने वाले अस्पताल में बेहोशी के नियमित चिकित्सकों की पड़ताल नहीं होती है।
ऐसे हो रहा चिकित्सकों का इंतजाम
निजी अस्पतालों में सर्जरी एवं बेहोशी के चिकित्सकों को प्रति केस दर निर्धारित करके बुलाया जाता है। इसमें सरकारी चिकित्सक भी शामिल रहते हैं। अस्पताल ड्यूटी के बाद निजी अस्पतालों में उनकी ड्यूटी शाम चार से पांच बजे के बाद शुरू हो जाती है। यह चिकित्सक एक साथ चार से पांच केस इकट्ठा होने पर पहुंचते हैं। जानकारों के मुताबिक प्रति केस बेहोशी के चिकित्सक को ढाई से तीन हजार और सर्जन को 10 से 15 हजार रुपये तत्काल मिलता है। यह धनराशि अस्पताल संचालक मुहैया कराते हैं। मरीज और उनके तीमारदार को यह पता नहीं चल पाता है। विभाग इन तथ्यों की जांच-पड़ताल करने से परहेज करता है।
निजी अस्पताल, पैथोलॉजी और अल्ट्रासाउंड सेंटरों की जांच लगातार कराई जा रही है। जहां चिकित्सक और पंजीकरण नहीं मिल रहा है उन्हें नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा जा रहा है, इसके बाद कार्रवाई की जाएगी।
- डॉ. आरएस दुबे, सीएमओ