प्रण लिया था कि जीते जी पुलिस कभी पकड़ नहीं पाएगी
- विवादित ढांचा ढहाने के समय विहिप के जिला संगठन मंत्री थे डॉ. वीरेंद्र त्रिपाठी
विकास कुमार पाठक
बस्ती। 1987 में लखनऊ में पढ़ाई के दौरान विश्व हिंदू परिषद से जुड़ गया था। इससे पहले लखनऊ में ही बजरंग दल के संयोजक के रूप में काम कर रहा था। छह दिसंबर 1992 को जब विवादित स्थल के पास हिंदू नेताओं की सभा चल रही थी, तभी गुंबद ढहाया गया था। हम वहां साथियों के साथ मौजूद थे। उक्त बातें बताते हुए शहर के प्रसिद्ध होम्योपैथी चिकित्सक डॉ. वीरेंद्र त्रिपाठी भावुक हो जाते हैं।
वह बताते हैं कि 1990 में राम मंदिर आंदोलन जोर पकड़ रहा था। तब चंपत राय और पुरुषोत्तम नारायण सिंह की प्रेरणा से मुझे विश्व हिंदू परिषद का लखनऊ का जिला संगठन मंत्री नियुक्त किया गया। 1992 में अयोध्या स्थित परिषद के मुख्य कार्यालय में कारसेवक इकट्ठा हो रहे थे। तब मुझे कारसेवकों के पहचान पत्र बनाने की जिम्मेदारी मिली थी। इसके अलावा संगठन के अन्य कार्यों में भी मुझे लगा दिया जाता था। उन दिनों कारसेवकों के लिए खाद्य सामग्री लखनऊ से लाने की जिम्मेदारी मुझे मिली थी।
चार दिसंबर को खाद्य सामग्री लेकर लखनऊ से अयोध्या आया था। पांच को वापस लखनऊ जाना था, लेकिन साथी कारसेवक रमेश, केशव, भोलेंद्र आदि की बैठकी के चलते वापस नहीं जा सकता। छह दिसंबर को हर हाल में लखनऊ जाना और खाद्य सामग्री लेकर आना था। ऐसे में कारसेवक पुरम में न रुककर अयोध्या के ही रहने वाले ट्रक चालक के घर जाकर रुक गया। छह दिसंबर को सुबह स्नान कर सुबह 11 बजे स्कूटर से अयोध्या बस स्टेशन पहुंचा और वहीं स्कूटर खड़ाकर कारसेवकों के कार्यक्रम स्थल पहुंचा।
उस समय मंच पर विहिप के अध्यक्ष अशोक सिंघल, ओंकार भावे, रामफल, गुलाब सिंह, परिहार जी, साध्वी ऋतंभरा, उमा भारती, विनय कटियार आदि भाषण दे रहे थे। दोपहर में करीब 12 बजे होंगे, भाषण सुनकर कुछ उत्साही नौजवान कारसेवक पुरम का बाड़ लांघकर गुंबद पर चढ़ने में कामयाब हो गए। कोई कुछ समझ पाता कि इससे पहले ही ढांचा ढहा दिया। इसके बाद विभाग संगठन मंत्री रामाधार ने मुझे डांटते हुए कहा कि तुम यहां क्या कर रहे, हमने मन की बात कही तो उन्होंने कहा कि तुरंत ट्रक लेकर लखनऊ के लिए निकलो।
लखनऊ पहुंचा तो राम भवन और भरत भवन के फोन के तार काटा व कार्यालय के कागजात रामभक्तों के घर में रखवाकर बंद कर दिया और वहां से निकल गया। शाम होते ही राष्ट्रपति ने सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया। आठ दिसंबर को सूचना मिली की ढांचा ढहाने की खुशी में गुजरात से एक ट्रक मिठाई आ रही है।
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ब्राह्मणों के घर में रिश्तेदार बनाकर ठहराते थे कारसेवक
बस्ती। 1992 के दौर में जिले में बड़ी संख्या में कारसेवकों का ब्राह्मणों के घर ठहराया जाता था। यहां के लोग पुलिस के भय से कारसेवकों को अपने घर में छिपा लेते थे। हरैया क्षेत्र के खैरी ओझा निवासी सेवानिवृत्त शिक्षक व भाजपा राम सिंगार ओझा आंदोलन के दौरान घटित घटनाओं को बताते हुए भावुक हो जाते हैं। वह कहते हैं कि नई पीढ़ी को यह याद रखना होगा कि श्रीराम लला के मंदिर निर्माण के लिए उनके पूर्वजाें ने तमाम बलिदान दिए हैं।
बताते हैं कि जब चप्पे-चप्पे पर पुलिस का पहरा होता था, तब वह गांव की पगडंडियों व सरयू की सोती से होकर कारसेवकों को अयोध्या भेजते थे। हर रामभक्त के घर में परिवार के साथ कुछ कारसेवकों के लिए भोजन बनवाया जाता था। कारसेवकों को रामभक्तों के घर ठहराया जाता था। जब पुलिस का छापा पड़ता था तब वह कारसेवक को रिश्तेदार बताकर पीछा छुड़ाते थे। बताते हैं कि क्षेत्र के महादेवरी, रजौली, लबदहा, त्रिलोकपुर, भदावल आदि ब्राह्मणों के गांवों में बड़ी संख्या में कारसेवकों को ठहराया जाता था। रातभर भोजन कराकर दुबौलिया के माझा से होकर शेरवाघाट से नाव के सहारे सरयू पार कराया जाता था।