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Basti News: जानलेवा बनता जा रहा माइक्रो फाइनेंस कंपनियों का मकड़जाल

Mon, 09 Sep 2024 03:19 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
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किस्त अदा न कर पाने की वजह से एजेंट करते हैं दुर्व्यवहार
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लालगंज के महसों व कलवारी के भंगुरा गांव में आत्महत्या कर चुके हैं कर्जदार
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। लालगंज क्षेत्र के महसों निवासी जितेंद्र की खुदकुशी ने एक बार फिर माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के मकड़जाल को उजागर कर दिया है। इससे पहले कलवारी के भंगुरा के दिलीप की मौत भी समूह से लिए गए कर्ज को न चुका पाने की वजह से हुई थी। आसानी से कर्ज मिलने की लालच में जरूरतमंद ग्रामीण इनकी हर बात मानते चले जाते हैं। मगर, एक बार रकम ले लेने के बाद अदा करने में उनकी उम्र बीत जाती है। उनके एजेंटों का उत्पीड़न बर्दाश्त न कर पाने की वजह से कर्ज लेने वाला अवसादग्रस्त हो जाता है।
जिले में विभिन्न नामों से दर्जन भर से ज्यादा कंपनियां कस्बों में कार्यालय खोलकर अपने एजेंट के जरिये मजदूर वर्ग का समूह बनाकर उन्हें कर्ज देने का कार्य कर रही हैं। इलाज, जरूरत का सामन खरीदने, शादी-ब्याह या अन्य आवश्यकता होने पर कमजोर तबका यह सोचकर उनसे कर्ज ले लेता है कि धीरे-धीरे कमाई कर किस्त भर देगा। मगर, भारी भरकम ब्याज के कारण वह निरंतर समय से किस्त नहीं अदा कर पाता है। जानकार लोगों का कहना है कि ऋण स्वीकृत होने के बाद रकम का एक हिस्सा प्रोसेसिंग चार्ज व बीमा के नाम पर काट लिया जाता है। यानी अगर किसी का 30 हजार रुपये ऋण स्वीकृत हुआ तो उसके हाथ में बमुश्किल 24-25 हजार रुपये ही आते हैं।
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किस्त नहीं दे पाया तो दे दी जान

कलवारी क्षेत्र के भंगुरा निवासी दिलीप ने घर बनवाने के लिए दो-तीन समूह से कर्ज ले लिया। किस्त का दबाव बढ़ने पर वह दिल्ली कमाने चला गया। इधर, घर पर पत्नी रीना को समूह की किस्त जमा करने के लिए उनके एजेंट परेशान करने लगे। इसी बीच 12 अगस्त 2024 को दिलीप दिल्ली से घर आया तो पत्नी ने समूह की किस्त जमा करने को कहा। इसी बात पर दोनों में कहासुनी हो गई। इससे नाराज होकर पत्नी मायके चली गई। इसी बीच रुपये न देने के कारण समूह के सदस्य उसके घर पहुंचे और गैस सिलिंडर, गैस चूल्हा तथा टीन शेड आदि लेकर चले गए। माना जा रहा है कि इसी उधेड़बुन में उसने बुधवार रात गांव के बाग में फंदा लगा लिया था।

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बिना समझे अंग्रेजी वाले फाॅर्म पर कर देते हैं हस्ताक्षर

बताया जा रहा है कि कर्ज देने की आड़ में पहले तो ये लोग ऐसे लोगों का चयन करते हैं जो अनपढ़ हो और आसानी से उनके जाल में फंस जाएं, जिन्हें फाइनेंस के नियम-कानून का ज्ञान न हो। इसके बाद उन्हें कर्ज देने के नाम पर फॉर्म से अतिरिक्त कई ऐसी शर्ते पूरा कराते हैं, जो उन्हें समझ में ही नहीं आता, जिसमें अंग्रेजी भाषा का फॉर्म भी शामिल होता है, जिसमें ये लोग बिना पढ़े ही अपने अंगूठा और हस्ताक्षर कर देते हैं। इसका पूरा फायदा ब्याज पर कर्ज देने वाले लोग उठाते हैं। कर्ज देने के नाम पर समूह के सदस्यों से इन लोगों का हस्ताक्षर किया हुआ चेक भी अपने पास बतौर गारंटी के रूप में रख लेते हैं। बाद में किस्त देने के नाम पर ऐसा ब्याज राशि भी जोड़ दिया जाता, जो शासन के मापदंडों के विपरीत है।

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दो से ढाई प्रतिशत लेते हैं ब्याज

इस कार्य में महिलाओं से ब्याज के रूप में मोटी रकम वसूली जा रही है तथा उनका आर्थिक शोषण किया जा रहा है। इन कंपनियों के प्रतिनिधियों ने महिलाओं के छोटे-छोटे समूह बनाकर उनकी जरूरतों की पूर्ति के लिए कर्ज बांट रखे हैं, जिस पर 24 से 30 प्रतिशत तक ब्याज वसूला जा रहा है। यानी दो से ढाई प्रतिशत महीने की दर से ब्याज लेते हैं।

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महिला के नाम पर कर्ज, पति होता है गारंटर

महिला सशक्तीकरण का नारा लगाने वाली इस तरह की कंपनियां आम तौर पर महिलाओं के नाम पर कर्ज देती हैं। उनकी दलील होती है कि पुरुष दुरुपयोग कर सकता है। मगर, कर्ज स्वीकृत करने के लिए पति-पत्नी दोनों की फोटो ली जाती है। दोनों से हस्ताक्षर कराए जाते हैं। उसके घर, चल-अचल संपत्ति का सर्वे कराया जाता है, ताकि किस्त न मिलने पर वे इसकी रिकवरी संपत्ति से कर सकें।
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यह है इसका मूल काम
माइक्रो फाइनेंस कंपनी मूल रूप से वित्तीय संस्थाएं हैं जो ऋण या बचत के रूप में छोटे पैमाने पर वित्तीय सेवाएं प्रदान करती हैं। इन कंपनियों को छोटे व्यवसायों के लिए ऋण प्रणाली को आसान बनाने के लिए पेश किया जाता है। क्योंकि उनकी जटिल प्रक्रिया के कारण उन्हें बैंकों से ऋण नहीं मिलता है। यह कंपनियां कंपनी एक्ट 1956 के तहत पंजीकृत होती हैं। जो रिजर्व बैंक के दिशानिर्देशों पर काम करती हैं।
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