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Basti News: कर्ज की किस्त अदा न कर पाने की जद्दोजहद बनी मौत का कारण

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कलवारी। थाना क्षेत्र के भंगुरा गांव के बाग में युवक का शव मिलने पर मौके पर पहुंची पुलिस फोर्स।
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आर्ट फिल्म की पटकथा जैसी है दिलीप की मौत की कहानी
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गांव के कई समूह से दिलीप ने लिया था कर्ज, निर्धारित तिथि पर किस्त जमा न करने पर एजेंट करते हैं कड़ाई
- किस्त के लिए उसकी पत्नी को करने लगे थे परेशान, कलवारी थाना क्षेत्र के भंगुरा निवासी दिलीप गौतम की मौत का मामला
संवाद न्यूज एजेंसी
कलवारी, बस्ती। थाना क्षेत्र के भंगुरा निवासी दिलीप गौतम की मौत किसी आर्ट फिल्म की पटकथा जैसी लगती है। जिसमें कर्ज में डूबा परिवार का मुखिया साहूकार से तरह-तरह की प्रताड़ना झेलता है। जिस तरह फिल्मों में साहूकार के गुंडे उसकी पत्नी-बच्चों को परेशान करते हैं। घर का सामान उठा ले जाते हैं। ठीक उसी तरह दिलीप के साथ भी हुआ। कर्ज की किस्त और ब्याज की रकम अदा न कर पाने की जद्दोजहद में वह सब कुछ गंवाता चला गया। अंतत: कुछ नहीं सूझा तो उसने इहलीला ही समाप्त कर ली।
पिछले वर्ष दिलीप पत्नी और बच्चों को लेकर बाकी परिवार से अलग हो गया था। उसने घर बनाने के लिए गांव में बने कई स्वयं सहायता समूह में सदस्य बन गया। जिसके जरिए उसने दो तीन समूह से लोन ले लिया। जिससे उसने अपना घर बनवाना शुरू किया। छत के समय पैसा कम पड़ जाने और किस्त का दबाव बढ़ने पर वह दिल्ली कमाने चला गया था।
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इधर, घर पर पत्नी रीना को समूह का किस्त जमा करने के लिए एजेंट उसे परेशान करने लगे। इसी बीच 12 अगस्त को दिलीप दिल्ली से घर आया तो पत्नी ने समूह का किस्त जमा करने को कहा। इसी बात को लेकर दोनों में कहासुनी हो गई। जिससे नाराज होकर वह मायके चली गई। इस बीच पैसा न देने के कारण समूह के सदस्य उसके घर पहुंचे और उसके घर से गैस सिलिंडर, चूल्हा तथा टिनशेड आदि उठाकर ले गए। माना जा रहा है कि इसी उधेड़बुन में उसने बुधवार रात गांव के बाग में फंदा लगा लिया।

समूह के सदस्यों व एजेंटों को सूंघ गया सांप
घटना के बाद से समूह से जुड़े सदस्यों को मानो सांप सूंघ गया हो। गांव के लोग बताते हैं कि उन सदस्यों में से ज्यादातर बृहस्पतिवार को गांव में भी नजर नहीं आ रहे थे। कोई कुछ बताने वाला नहीं मिला कि समूह की बैठक में बुधवार को क्या बातचीत हुई थी। कर्ज देने वाले एजेंटों का भी कुछ पता नहीं है। पुलिस से परिवार के लोगों ने शिकायत नहीं की है, इसलिए वह भी फिलहाल चुप हैं।

तीन शर्तों पर लिया था कर्ज
गांव में लोगों की छोटी-छोटी जरूरतों को पूरी करने के लिए निजी माइक्रो फाइनेंस कंपनियां लोन देती हैं। जो अपने एजेंटों के माध्यम से लेनदेन का काम करती हैं। इनमें कुछ समूह साप्ताहिक, कुछ पाक्षिक और कुछ मासिक किश्त वसूलते हैं। इनका ब्याज एक या दो प्रतिशत मासिक होता है। समय पर किश्त जमा न होने पर इनके एजेंट घर पहुंच जाते हैं। तय समय पर किश्त जमा न होने पर पूरे समूह के लोग कड़ाई करते हैं। यहां तक कि घर का सामान तक उठा ले जाते हैं। दिलीप के साथ भी ऐसा ही हुआ।
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पुलिस को नहीं दी गई तहरीर
घटना की सूचना के बाद दिलीप की पत्नी रीना भी रोती-बिलखती पहुंची। पूछने पर उसने किसी से कुछ नहीं बताया कि पूरा माजरा क्या रहा। शव का टांडा घाट पर अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान पुलिस भी मौजूद रही। मगर पुलिस को किसी तरह की तहरीर नहीं दी गई है। एसओ कलवारी भानु प्रताप सिंह ने बताया कि तहरीर नहीं मिली है लेकिन पुलिस अपने स्तर पहलुओं की छानबीन कर रही है।
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