पूर्व में तत्कालीन डीएम और एडीजी ने की थी चौराहों को गोद लेने की पहल
कई बार चौराहों को सुंदर बनाने की बनी रणनीति, धरातल पर नहीं उतर पाई योजना
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। अपने शहर की पहचान बदरंग चौराहों से हो रही है। राष्ट्रीय राजमार्ग एनएचएआई की सड़क से शहर में प्रवेश करिये या रेल मार्ग से आने के बाद रेलवे स्टेशन के बाहर निकलिए या फिर रोडवेज से शहर की राह पकड़िए हर जगह उजड़ा चमन सा दृश्य दिखाई पड़ रहा है। अस्त-व्यस्त चौराहे, चहुंओर गंदगी, धूल की मोटी की परतों से ढकी महापुरुषों की प्रतिमाएं शहर के पिछड़ेपन का एहसास करा रही हैं। आइए, ले चलते हैं आपको शहर के प्रमुख चौराहों पर, जहां पिछले एक दशक से विकास की नई लकीर नहीं खींची जा सकी है।
किसी शहर या नगर के लिए वहां के चौक-चौराहे ही मुखौटा होते हैं। हिंद साहित्य के महान समालोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इस शहर के मुखौटे अब भी बदहाल है। इनकी बदसूरती पर शहर खुद मुंह चुरा रहा है। देश-विदेश से यहां आने वाले पर्यटकों, व्यापारियों को रिझाने के लिए शहर के पास कोई सुंदर चौक-चौराहा नहीं है। इसीलिए मन बहलाने के लिए किसी भी चौराहों पर आमजन का ठहराव नहीं है। बस पैदल या वाहनों से चलते समय लोग इन चौराहों की दुश्वारियों को निहारते हुए आगे बढ़ जा रहे हैं।
एक दशक से ऊपर की अवधि बीतने को है, लेकिन इन चौराहों के सुंदरीकरण की कोई ठोस पहल होती नहीं दिखी। इसके पहले एक दर्जन स्थानों पर महापुरुषों की प्रतिमाएं लगवाई गई थीं। कुछ ही दिनों के बाद वह भी उपेक्षित हो गईं। इन प्रतिमाओं की देखरेख करने वाला कोई नहीं है। धूल की मोटी परत महापुरुषों की प्रतिमाएं ढक उठी हैं। समय बीता तो चौराहों के रौनक में और चार चांद लगने के बजाय रंग ही फीका पड़ गया।
गांधीनगर बाजार का मुख्य चौराहा पक्के हैं। यहां ठीक चौराहे पर ही सड़क की पटरी पर पुलिस चौकी है। चौराहे की पहचान के रूप में यहां कोई भी निर्माण अब तक नहीं किया गया है। बस यात्रियों और खरीदारों की भीड़ है और दुकानों की भरमार। जाम लगने के समय यहां पता नहीं चलता कि यह इस बाजार का मुख्य चौराहा है।
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बदहाल रेलवे स्टेशन चौराहे
रेलवे स्टेशन चौराहे की स्थिति शुरू से बिगड़ी हुई है। इधर पांच सालों में यहां स्थाई अतिक्रमण हटाकर चौराहे के क्षेत्रफल को बढ़ाया गया है। मगर, सुंदरीकरण के नाम पर कुछ भी नहीं हुआ है। हरियाली, ट्रैफिक सिग्नल जैसी कोई भी व्यवस्था नहीं है। यहां किसी महापुरुष की प्रतिमा भी नहीं है। हर समय यह चौराहा वीरान सा रहता है।
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रोडवेज तिराहे पर भी नहीं बिखेर पाए रौनक
रोडवेज तिराहे पर दो दशक पूर्व सरदार भगत सिंह की प्रतिमा स्थापित कर छोटा सा पार्क बनाया गया था। मगर, अतिक्रमण के चलते यह स्थल भी रौनक नहीं बिखेर पाया। वर्तमान में नजदीक से निहारने पर ही यह पार्क दिख रहा है। एक तरफ अतिक्रमण है तो दूसरी तरफ शौचालय बना दिया गया है। पार्क के अंदर की हरियाली गायब है।
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घोड़े पर बैठे नेहरूजी भी देख रहे बदहाली
रोडवेज से 50 मीटर दूर स्थित तिराहे पर घोड़े पर बैठे नेहरूजी की प्रतिमा गोलंबर के बीच बनाई गई है। मगर, यहां नियमित सफाई नहीं होती है। गोलंबर में हरियाली और लाइट की व्यवस्था बदहाल हो गई है। शुक्र मानिए उन सब्जी विक्रेताओं को जो प्रतिदिन शाम को यहां सब्जियों को ठेला सजाते हैं। इस नाते भीड़ जुट जाती है। बाकी समय घोड़े पर बैठे नेहरूजी यहां की बदहाली निहारते रहते हैं।
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कंपनी बाग गुरु गोविंद सिंह साहिब का निशान
कंपनी बाग शहर के वीआईपी चौराहों में शुमार है। यहां एक दशक पहले सिख समुदाय की सहभागिता से गुरु गोविंद सिंह साहिब के निशान की निर्माण किया गया। इसके अलावा प्रकाश की जगमगाहट के साथ ट्रैफिक सिग्नल का इंतजाम हुआ। यह व्यवस्था बहुत दिनों तक चल नहीं पाई। वर्तमान में यह चौराहा बदहाल है। ट्रैफिक सिग्नल खराब है।
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बड़ेवन में उपेक्षित हैं आचार्य राम चंद्र शुक्ल की प्रतिमा
एनएचएआई की सड़क से शहर में प्रवेश करते ही बड़ेवन चौराहा है। यहां पांच साल पहले आचार्य राम चंद्र शुक्ल की आदमकद की प्रतिमा स्थापित हुई। चारोंतरफ पार्क बनाया गया। इसी के बाद इस स्थल को उपेक्षित छोड़ दिया गया। पार्क में एक पौधे भी नहीं लगाए गए। अब यहां अवैध टैक्सी स्टैंड संचालित हो रहा है।
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फव्बारा चौराहा की हालत दयनीय
सदर तहसील के पास फव्वारा चौराहा डेढ़ दशक पहले जिस सौंदर्य को प्राप्त किया था, आज वह खत्म हो चला है। यहां फव्वारा मशीन का अब अवशेष बचा है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा बदरंग हालत में है। फुलवारी भी गायब है। फल और टैक्सी वालों की भरमार है।
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शास्त्री चौक भी हो गया उपेक्षित
शहर का शास्त्री चौक भी उपेक्षित हो गया है। सांसद ने यहां लाल बहादुर शास्त्री की प्रतिमा के पास तिरंगा लगवाया था। इसके बाद से इस चौराहे को विकसित नहीं किया गया है। यहां चारों तरफ सब्जी एवं ठेले वालों का अतिक्रमण है। जबकि इसी रास्ते जिले के आला अफसर गुजरते हैं।
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पांच साल पहले गोद लेने की बनी थी योजना
शहर के प्रमुख चौराहों को संवारने के लिए पांच साल पहले तत्कालीन डीएम ने योजना तैयार की थी। इसके तहत प्रमुख चौराहों को निजी एवं सरकारी क्षेत्र के बैंक, व्यापारी संगठनों व अन्य कारपोरेट एजेंसियों को गोद लेने के लिए आह्वान किया गया। मगर, यह योजना कागज में होकर रह गई। इसके बाद एडीजी गोरखपुर ने भी यहां भ्रमण के दौरान पुलिस अधिकारियों को चौराहों को विकसित करने के लिए प्रेरित किया था। मगर, उनके जाने के बाद यह भूली विसरी बात होकर रह गई।
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हम लोग जब शहर में आते हैं तो चौराहों की स्थिति देखकर मन दुखी हो जाता है। सचमुच बड़े शहरों की तरह सुसज्जित चौराहे यहां नहीं है।
-डॉ. निधि मिश्रा, रोडवेज
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चौराहों के विकास के लिए ठोस योजना बननी चाहिए। शहर की सुंदरता की प्रथम कड़ी यहां के चौराहे हैं। जब भी कोई बाहर से आता है तो पहले निगाह चौराहों पर पड़ती है।
-कैलाश नाथ दुबे, शिक्षाविद्
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कोट
शहर के प्रमुख चौराहों को विकसित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। कार्ययोजना में प्रमुख चौराहों को शामिल किया जाएगा। निजी क्षेत्र की संस्थाओं से भी सहयोग की अपील की जाएगी।
-दुर्गेश्वर त्रिपाठी, ईओ, नगर पालिका