बस्ती। यदि आप ने जमीन की रजिस्ट्री कराई है या फिर पैतृक संपत्ति की वरासत कराना चाहत रहे हैं, तो राजस्व कर्मियों को सुविधा शुल्क देना होगा। अफसर बताते हैं कि यह काम निशुल्क होता है, लेकिन दाखिल खारिज या पैतृक संपत्ति अपने नाम कराने वाला हर शख्स जानता है कि 1500 से 25,000 रुपये अतिरिक्त देने पड़ते हैं।
जमीन की रजिस्ट्री के दौरान इसे क्रेता से लिया जाता है। रुपये नहीं मिलने पर संबंधित कर्मचारी कोई न कोई पेंच लगाकर फाइल लौटा देते हैं। तहसील में टहलते ऐसे कई लोग प्रतिदिन मिलते हैं, जिनका सुविधा शुल्क न देने की वजह से दाखिल-खारिज नहीं हो पा रहा है।
सदर तहसील के निबंधन कार्यालय में प्रतिदिन औसतन 20-25 रजिस्ट्री होती है। रजिस्ट्री के दौरान दो प्रतियों में दस्तावेज जमा कराए जाते हैं। लिखा-पढ़ी करके एक प्रति दूसरे दिन तहसील में भेज दी जाती है। उसके 35 दिन बाद मूल दस्तावेज तहसील में प्रस्तुत करने होते हैं, ताकि खारिज दाखिल हो सके। यदि विक्रेता ने कोई आपत्ति कर दी तो खारिज दाखिल नहीं हो सकेगा।
तहसील में 45 दिन के भीतर खारिज दाखिल की प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए, लेकिन, इसमें छह महीने से 10 साल तक का समय लगना आम बात हो गई है। दाखिल खारिज के लिए बैनामे के बाद से ही तहसील कर्मचारी रुपये के फेर में लग जाते हैं। कई बार ऐसा होता है कि सभी प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद आवेदक परेशान रहते हैं।
2001 में संतराम से 13 एअर जमीन बैनाम लिया था। 2007 में एक बार खतौनी निकलवाई थी तब नाम था। तीन अप्रैल 2023 को दोबारा खतौनी निकलवाया जिसमें मेरा नाम नहीं है। लेखपाल ने बताया कि इसके लिए तहसील में वाद दाखिल करना पड़ेगा। 10 हजार रुपये से अधिक खर्च हो गया लेकिन कुछ हुआ नहीं।
-राम रूप, हवेलीखास
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पैतृक जमीन जो कि मेरे पिता राम शंकर के नाम थी। उनके निधन के बाद यह संपत्ति मेरे नाम होनी थी। वरासत में मेरे पिता का नाम गलत कर दिया गया। इसे ठीक कराने में 10 साल बीत गए। अभी तक ठीक नहीं हुआ। इन सालों में लाख रुपये से अधिक फीस और अधिकारियों काे खुश करने में खर्च हो गए, लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ।
-रामदुलारे, पिकौरा दत्तूराय
मरवटिया और नरहरिया में मेरे पिता स्व. रामानंद के नाम पैतृक संपत्ति है। 12 साल पहले पिता की मृत्यु हो चुकी है। मैं उनकी इकलौती संतान हूं। किंतु, पिता की संपत्ति मेरे नाम अभी तक वरासत नहीं हो पाई। इस संबंध में कई बार तहसील अधिकारियों व कर्मियों से मिल चुका हूं, लेकिन, बेवजह इतने लंबे समय से मामले को उलझा कर रखा गया है। मैं आर्थिक रूप से बेहद कमजोर हूं, इसलिए मेरी सुनवाई नहीं हो रही है।
-राघवशरण, नरहरिया