मूर्तिकारों को आस, इस बार अंबे मैया लगाएंगी बेड़ा पार
पिछले दो वर्ष से चौपट रहा मूर्तियों का कारोबार
जिले में करीब पांच हजार मूर्तियां की जाती हैं स्थापित
बस्ती। कोरोना का दंश झेल रहे मूर्तिकारों को इस बार अब मां दुर्गा से आस है। कोरोना काल में लॉकडाउन लगने से मूर्तिकारों का काम ठप हो गया था। साल दर साल उन्हें घाटा होता गया और महंगाई बढ़ती गई। अब जब कोरोना का साया कम हुआ तो मूर्तिकारों ने भी दुर्गा जी की मूर्तियां बनानी शुरू कर दी है।
मूर्तिकारों का कहना है कि इस साल शायद मातारानी उनका बेड़ा पार लगाएंगी। जिले में शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में मिलाकर करीब पांच हजार दुर्गा प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। ज्यादातर मूर्तिकार कोलकाता से आकर मूर्तियां बनाते हैं। यहां दो तिहाई प्रतिमाओं का विजय दशमी के दिन विसर्जन किया जाता है। जबकि बाकी प्रतिमाओं का शरद पूर्णिमा के दिन विसर्जन किया जाता है।
जनपद में 50 से ज्यादा मूर्तिकार मूर्ति बनाते हैं। एक कारीगर पहले 200 के आसपास मूर्ति बनाता था। अब वह बिक्री न होने के डर के 150 मूर्तियां ही बना रहा है। उनका कहना है कि एक फीट से लेकर 18 फीट तक की मूर्ति बनाई जा रही है। हालांकि इस बार दुर्गापूजा में फिर से पहले जैसी रौनक लौट आने की उम्मीद है।
24 परगना पश्चिम बंगाल के अमृत लाल बताते हैं कि कोरोना के पहले सबकुछ ठीक चल रहा था। गणपति पूजा, दीपावली में लक्ष्मी पूजा और नवरात्रि में मूर्तियां बनाकर इतनी कमाई हो जाती थी कि साल भर की रोटी का इंतजाम हो जाता था। इस बार उम्मीद है कि दुर्गापूजा में फिर से माता रानी की कृपा से सब ठीक हो जाएगा।
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बढ़ी लागत, महंगी हुई प्रतिमा
वस्तु पहले अब
पुआल पांच हजार रुपये की ट्रॉली आठ हजार की ट्रॉली
मिट्टी पांच हजार की ट्रॉली नौ हजार की ट्रॉली
बांस 240 रुपये प्रति बांस 350 रुपये प्रति बांस
रंग-पेंट सात सौ रुपये किलो 12 सौ रुपये किलो
पीओपी 90 रुपये किलो 150 रुपये किलो
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पिछली बार एडवांस देने के बाद भी नहीं ले गए मूर्ति
मूर्तिकार जितेंद्र कुशवाहा बताते हैं कि बड़े व सार्वजनिक आयोजनों पर रोक के कारण पिछले तीन वर्ष से कारोबार चौपट हो गया था। पिछले सीजन में तैयार की गईं तमाम मूर्तियों को एडवांस देने के बावजूद आयोजक नहीं ले गए, जिससे काफी घाटा हुआ। इस बार स्थिति सामान्य लग रही है।