संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। दुर्गा प्रतिमाओं के ईको फ्रेंडली विसर्जन का फार्मूला काम नहीं आया। पहले से तैयार किए गड्ढे में नदी का पानी भर जाने के बाद मजबूरन कुआनो नदी में प्रतिमाओं को प्रवाहित करना पड़ा। हालांकि, इस बार प्रतिमाओं के साथ बेकद्री नहीं होने दी गई।
मगर, कुआनो के पानी में केमिकल वाले रंगों से रंगी गईं प्रतिमाओं और अन्य हानिकारक तत्वों को घुलने से नहीं बचाया जा सका। विसर्जन घाट पर जगह की कमी की वजह से प्रशासन के प्रयास के बावजूद गड्ढे में विसर्जन की तरकीब धरातल पर नहीं उतर पाई।
इस बार घाट पर ऐसी व्यवस्था बनाई गई थी कि प्रतिमाओं को क्रेन की मदद से नदी की धारा तक ले जाया गया। इससे किसी भी प्रतिमा के साथ बेकद्री जैसी स्थिति नहीं आने पाई।
पिछले वर्ष हुई प्रशासन की किरकिरी से सबक लेते हुए इस बार विसर्जन समाप्त होने के बाद जेसीबी से बचे हुए प्रतिमाओं के अवशेष भी खुरच-खुरचकर पानी में डालते देखा गया।
प्रतिमाओं की संख्या का सही आंकलन न होने से शुक्रवार दोपहर एक बजे तक विसर्जन का क्रम चलता रहा। प्रतिमा लेकर गए कमेटी के लोग और ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी थककर चूर दिखे। बावजूद इसके विसर्जन संपन्न कराया गया।
शहर एवं आसपास के क्षेत्र में 300 से अधिक पंडालों में दुर्गा प्रतिमा स्थापित होती हैं। यहां नवरात्र के सप्तमी के दिन से पूजा उत्सव शुरू होता है। पूर्णिमा के दिन प्रतिमाओं का विसर्जन अमहट घाट पर कुआनो नदी में कर दिया जाता है।
अनुमान के मुताबिक प्रत्येक साल दुर्गा पूजा समाप्त होने के बाद अमहट घाट पर कुआनो नदी में विभिन्न देवी-देवताओं की 1500 प्रतिमाएं विसर्जित की जाती हैं।
इससे काफी हिस्से में नदी प्रदूषित हो जाती है। इससे बचने के लिए इस बार गड्ढे खोदने की तरकीब निकाली गई थी। मगर, अंतिम समय में घाट के पास पानी भर जाने से किए-कराए पर पानी फिर गया।