पैथोलॉजिस्ट न लैब टेक्नीशियन, अयोग्य लोग कर दे रहे खून की जांच
निजी क्षेत्र के पैथोलॉजी में खून जांच कराने में लग रहे 500 से दो हजार
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। निजी क्षेत्र की चिकित्सा व्यवस्था प्रत्येक चरण पर महंगी है। यदि आप बीमार हुए तो हाथ से खून और जेब से रुपये एक साथ निकालना पड़ेगा। फिर भी भरोसे का इलाज संभव नहीं है। निजी अस्पतालों में बीमारियों की जांच के नाम पर भी बड़ा खेल हैं। एक पैथोलॉजी की रिपोर्ट दूसरे जगह मान्य नहीं होती है। जहां दिखाओ वहां अलग से जांच कराओ, तभी चिकित्सक दवा लिख रहे हैं। फायदा नहीं हुआ तो सभी खर्चे व्यर्थ हो जाएंगे। नए चिकित्सक के पास जाएंगे तो जांच फिर से करानी पड़ेगी।
जिले में खून जांच के लिए पैथोलॉजी की बाढ़ आ गई है। मुख्यालय से लेकर ग्रामीण अंचल के सरकारी अस्पतालों के आसपास कई-कई पैथोलॉजी हैं। वहीं निजी अस्पतालों में भी खून जांच के सेंटर खोले गए हैं। सभी सेंटरों की अलग-अलग सेटिंग है। यदि किसी डॉक्टर की सलाह पर उनके बताए हुए पैथोलॉजी में आप खून की जांच करा लिए हैं और वह रिपोर्ट लेकर दूसरे डॉक्टर के पास पहुंच गए तो यह मान्य नहीं होगा। आपको फिर संबंधित चिकित्सक के बताए हुए पैथोलॉजी सेंटर पर दोबारा जांच करानी पड़ेगी।
जानकार इसके पीछे सेटिंग का खेल बता रहे हैं। उनका कहना है कि मरीज के इलाज में सिर्फ परामर्श शुल्क और दवाओं में कमीशन से ही रुपये नहीं कमाए जाते हैं। जांच में भी आधे की हिस्सेदारी बनती है। इस वजह से चिकित्सक अपनी सेटिंग के पैथोलॉजी की जांच रिपोर्ट को सही ठहराते हैं। खून की जांच भी महंगे दर पर हो रही है। बुखार, खांसी, पेट दर्द, गैस, भूख न लगने जैसी शिकायत पर चिकित्सक अमूमन मलेरिया, निमोनिया, पीलिया, सीबीसी, एलएफटी, केएफटी, शुगर आदि जांच पर्चे पर लिख दे रहे हैं।
निजी पैथोलॉजी सेंटरों पर 500 से दो हजार रुपये तक इस जांच की कीमत वसूली जा रही है। जानकारों के अनुसार इसमें आधा हिस्सा चिकित्सक का बनता है। यही वजह है कि मरीजों को मूल पर्चे के साथ जांच सेंटर का नाम पता भी दे दिया जाता है। यदि मरीज अपने किसी जानने वाले लैब से जांच करा लिया तो उसकी रिपोर्ट पर तुरंत संदेह प्रकट कर दिया जाता है।
...
ऐसे बनता हैं डॉक्टर साहब का हिसाब
पैथोलॉजी में सेटिंग के अनुसार जिन चिकित्सकों के पर्चे की जांच आती है, उन्हें बाकायदा नोट कर लिया जाता है। दो से तीन घंटे के बाद मरीज को रुपये लेकर रिपोर्ट सौंप दी जाती है। शाम को एक-एक चिकित्सक या निजी अस्पताल के प्रति पर्चे के मुताबिक हिसाब बनाकर अलग कर दिया जाता है। पैथोलॉजी संचालक इसे बाद में चिकित्सक तक पहुंचा देता है। कुछ पैथोलॉजी संचालक अनजाने में किसी डॉक्टर का पर्चा आने पर उन्हें भी उनका हिस्सा पहुंचाते हैं, ताकि उनकी छवि अच्छी बनी रहे।
...
अधिकतर लैब पर पैथोलॉजिस्ट नहीं
शहर से लेकर ग्रामीण अंचल में सौ से अधिक पैथोलॉजी सेंटर संचालित किए जा रहे हैं। लेकिन, अधिकतर लैब में पैथोलॉजिस्ट और लैब टेक्नीशियन नहीं है। अलबत्ता लैब में काम कर जांच प्रक्रिया को सीख जाने वाले लोग ही पैथोलॉजी संचालित कर रहे हैं। शुगर से लेकर गंभीर बीमारियों तक की जांच अयोग्य लोग कर रहे हैं। यह कई बार पकड़ में भी आ चुके हैं। महिला अस्पताल और ओपेक कैली के सामने एसडीएम एवं स्वास्थ्य विभाग के छापे में पैथोलॉजिस्ट एवं एलटी न होने की वजह से आधा दर्जन लैब के संचालक भाग खड़े हुए थे। इसमें कई लैब सील कर दिए गए थे।
...
निजी अस्पतालों में बना ब्लड कलेक्शन सेंटर
पैथोलॉजी संचालकों का संजाल निजी अस्पतालों में भी फैला हुआ है। प्रत्येक अस्पताल में अलग-अलग सेंटरों का ब्लड कलेक्शन काउंटर स्थापित है। पर्चे पर जांच लिखते ही इस काउंटर पर बैठे लोग मरीज के खून का नमूना निकाल लेते हैं। 8 से 10 मरीजों का ब्लड कलेक्शन होने के बाद उसे संबंधित सेंटर पर पहुंचा दिया जाता है। यहां मशीनों से जांच कर कंप्यूटराइज्ड रिपोर्ट लाकर अस्पताल में दे दी जाती है।
...
रिपोर्ट में केवल जांच सेंटर का नाम
मरीजों की जांच रिपोर्ट वाले पेपर पर केवल जांच सेंटर का नाम और मोबाइल नंबर ही अंकित रहता है। यहां कौन पैथोलॉजिस्ट और एलटी जांच के लिए अधिकृत है, उनका नाम नहीं रहता है। रिपोर्ट के नीचे किसी अधिकृत व्यक्ति का हस्ताक्षर भी स्पष्ट नहीं रहता है। बिना हस्ताक्षरयुक्त रिपोर्ट दे दी जा रही है और इलाज करने वाले चिकित्सक उसे मान भी रहे हैं।
..
कोट
निजी अस्पताल और पैथोलॉजी सेंटरों की जांच के लिए अभियान चलाया गया था। कुछ लोग इसका विरोध करने लगे और अनावश्यक आरोप भी लगाना शुरू कर दिए। लेकिन, विभाग इससे घबराने वाला नहीं है। जल्द ही अभियान शुरू किया जाएगा। यदि अयोग्य लोग जांच करते पाए गए तो संबंधित पर कार्रवाई होगी।
-डॉ. आरएस दुबे, सीएमओ