वायुमंडल में बढ़ रहा ब्लैक कार्बन, सल्फर डाई आक्साइड का भी स्तर खतरनाक
संवाद न्यूज एजेसी
बस्ती। कोरोना काल में हवा की गुणवत्ता बहुत हद तक सुधर गई थी। तब खुले में सांस लेने वाली स्थिति बनी थी। उसके बाद जैसे-जैसे कल कारखाने और वाहन दौड़ने लगे, फिर शहर की हवा में जहर फैलता चला गया। मौजूदा हाल में अपने जिले में कोरोना के समय की तुलना में ब्लैक कार्बन नाम का यह जहर वायुमंडल में अब करीब आठ से दस गुना ज्यादा है। सेहत के लिए बेहद खतरनाक सल्फर डाई आक्साइड की मात्रा भी 60 से 70 फीसदी तक बढ़ गई है।
यह जानकारी केडीसी के भौतिक विज्ञान के प्रवकता डॉ. धर्मेंद्र सिंह ने दी है। उन्होंने बताया कि यह तथ्य गोरखपुर विश्वविद्यालय के भौतिकी विज्ञान विभाग के ''एनवायरमेंटल साइंस एंड पॉल्युशन'' पर कराए रिसर्च में सामने आया है। हाल ही में शोध पत्र का प्रकाशन भी हुआ।
शोध में आए तथ्यों का फिर मौजूदा समय के प्रदूषण से मिलान करने पर यह तस्वीर सामने आई है। शोध मं पिछले पांच साल की तुलना में लाकडाउन के समय पर्यावरण में एरोसेल ऑप्टीकल डेप्थ और ब्लैक कार्बन का अध्ययन किया गया। अध्ययन में पाया गया कि पर्यावरण में एरोसेल से मानव जनित कण (सल्फेट, नाइट्रेट व ब्लैक कार्बन आदि) में काफी कमी आ गई थी। पर्यावरण में सल्फेट व नाइट्रेट नहीं के बराबर पहुंच गए थे। जबकि कृषि कार्य में रोक नहीं होने के चलते पर्यावरण में ब्लैक कार्बन दो से तीन माइक्रोग्राम पर घन मीटर पाया गया।
कोरोना के पहले यह सात से दस और मौजूदा समय में 15 से 20 माइक्रो ग्राम प्रति घन मीटर हो गया है। इसी प्रकार सल्फर डाई आक्साइड की मात्रा कोरोना के समय 60 फीसदी तक कम हो गई है और मौजूदा समय में यह बढ़कर 70 से 80 फीसदी तक पहुंच गई है।
भौतिक विज्ञान विभाग के प्रोफेसर धर्मेंद्र सिंह ने बताया कि रिसर्च के पीछे पर्यावरण में फैले मानव जनित कणों का पता लगाना था। कौन से कण किसके उत्सर्जन से फैले हुए हैं, उसका पता लगाकर आवश्यकता पड़ने पर उसपर अंकुश लगाया जा सके। लाकडाउन होने से कल-कारखाना बंद होने, वाहनों का कम चलने, जनरेटर आदि का कम प्रयोग आदि से पर्यावरण में ब्लैक कार्बन के साथ अन्य मानव जनित कण में अत्यधिक कमी आया। जबकि लॉकडाउन खुलते ही प्रदूषण उसी स्तर पर पहुंचने लगा।