बस्ती। अपने शहर में भी ऐसा परिवेश पनप रहा है, जिसमें टीन एजर्स को लुभाने वाले रेस्तराओं की भरमार है। अंग्रेजी के टेढ़े मेढ़े अक्षरों में बीटेक... एमटेक... वेंचर्स... और न जाने कौन-कौन से नाम लिखे बोर्ड के पीछे नए लुक का मीट हाउस है। बाहर शीशे का डोर, अंदर सुविधाएं बिल्कुल नए अंदाज की लकदक। रंगीन पर्दों से घिरे केबिन और उसमें मध्यम रोशनी। व्यवधान कुछ भी नहीं बिल्कुल शैपरेट व्यवस्था।
गिलास में दूध या जूस की जगह अलग किस्म का रंगीन शेक...। बगल में गुड़गुड़ी के साथ कोमल सीने तक धुआं उतारने वाला हुक्का भी है। यह शौक फरमा रहे है बिल्कुल नई उम्र के शोहदे।
यकीन मानिए, अपने शहर में भी टीन एजर्स भटकाव की राह पर हैं। यदि आपका बच्चा बड़ा हो रहा है, तो थोड़ा उसके चाल-चलन को लेकर आप भी सजग हो जाइए। आसमान की ओर खड़ा झब्बर... झब्बर बाल, निकिल वाले फ्रेम में बहुरंगी रंग फेकता चश्मे का शीशा... पतली मोहड़ी वाली पैंट और उसके ऊपर बटन छटकी हुई चिपकी शर्ट का शौक उभरती हुई जिंदगी का हुलिया बिगाड़ दे रही हैं।
यहां तक भी हो तो गनीमत। इनकी शगल में मीट-टू- गेदर भी शामिल है। इसके लिए शहर में नए वर्जन के रेस्तरां इनके मन पसंद अड्डे बन गए हैं। जहां बर्थ-डे पार्टी एवं युवा जोड़ों को बैठने के लिए बाकायदा केबिन की सुविधा दी जा रही है। यहां बड़े शहरों के किसी महंगे क्लब से कम व्यवस्था नहीं है। घंटे के हिसाब से प्रति केबिन 500 से 600 रुपये चार्ज है। इसमें हुक्के के कश फ्री हैं। गद्देदार सोफा और नॉक करने पर ही वैरा उपलब्ध होने की व्यवस्था है।
इसके अलावा कोल्ड िड्रंक अन्य तरह के शेक एवं खानपान के अन्य सामग्री का ऑर्डर देने पर मिलता है, जिसका बिल अलग से चुकता करना होता है। दो से ढाई हजार के खर्च में 4-6 युवाओं की किटी पार्टी आराम से हो जा रही है। खासकर टीन एजर्स ही इसमें हिस्सा ले रहे हैं। या यूं कह लें कि अधिकांशत: कक्षा-9 से 12 तक के बच्चे ही शामिल हो रहे हैं, तो गलत नहीं होगा। स्कूल छुट्टी के बाद शाम के समय इनकी बाइक ऐसे ही रेस्तराओं के सामने आकर खड़ी हो जा रही है। कोई समूह में पहुुंच रहा है, तो कोई जोड़े से। रोकने-टोकने वाला इन्हें कोई नहीं है।
अभिभावकों की भी नजर से बिल्कुल दूर हैं। कभी खुद की तो कभी दोस्त की किटी पार्टी देर तक चल रही है। किसी-किसी केबिन में युवाओं का साथ देने के लिए हम उम्र गर्ल फ्रेंड भी पूरे इंज्वाय में देखी जा रही हैं। शायद अभिभावक को यह सब नहीं पता होता है। उन्हें बस इतना मालूम है कि उनका बच्चा किसी दोस्त की बर्थ-डे पार्टी में है। सच तो यह भी है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल की साहित्य से भरी यह बस्ती है तो, महर्षि वशिष्ठ की तपोभूमि भी है। मगर यह समझकर इस मुगालते में न रहिये कि परिदृश्य आज भी वैसा ही है। यदि अपने बच्चों को लेकर सचेत नहीं रहेंगे चढ़ती उम्र में ही उसकी लत बिगड़ जाएगी।
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हाईवे के नजदीकी क्षेत्रों में रेस्तराओं की भरमार
नई पीढ़ी के लिए रेस्तराओं की भरमार हाईवे से सटे क्षेत्रों में है। शहर का किनारा होने के नाते यहां अभिभावकों का आना जाना कम रहता है। कोर्ट, कचहरी, दफ्तर, बाजार सब शहर में है। मम्मी- पापा का निकलना होता है, तो शहर तक ही रह जाते हैं। उधर शोहदे इन रेस्ताराओं में घंटे दो घंटे बैठकर न जाने क्या-क्या गुल खिलाकर लौट आते हैं। बड़ेवन, हरदिया, पटेल चौक, पचपेड़िया मार्ग और टोल प्लाजा के निकट के कुछ ढाबे युवाओं के मीट-टू-गेदर का अड्डा बने हैं।
हेलो... आओ यार बर्थ-डे पार्टी है
हेलो...। हां यार, आज बर्थ-डे है। तुम्हें भी आना है। आओ यार...। कहां... वहीं ... हाईवे वाले ... रेस्तरा में। हां एक केबिन ले लेंगे। वहीं केक भी कट जाएगा और किटी पार्टी भी हो जाएगी। हम चार पांच लोग रहेंगे। ओके, डन... चलो शाम को चार बजे तक आ जाना...बाय। यह है मोबाइल फोन पर टीन एजर्स की आपस में बोलचाल की भाषा। सब कुछ फोन पर तय होने के बाद निर्धारित ठिकानों पर सज जाती है पार्टी।
रील भी बनती है
इन रेस्ताराओं में केक पार्टी की रील भी बड़े शौक से बनती है। एक दूसरे के चेहरे पर केक की क्रीम लगाकर अलग-अलग अंदाज में वीडियो क्लीपिंग तैयार की जाती है। रेस्तरां की दीवारों पर सुंदर आकृतियों की सजावट में खड़े होकर युवाओं को फोटो खिंचवाने और वीडियो बनाने का चलन भी खूब है।
बच्चा जब छोटा हो तब और जब किशोरावस्था में पहुंचे तब अभिभावकों को उन पर विशेष ध्यान देना चाहिए। भटकाव का असली समय किशोरावस्था ही है। बच्चे केवल बड़े हो जाते हैं, परिपक्वता नहीं होती है। अभिभावक उनके साथ साए की तरह खड़े रहें, यह उनकी जिम्मेदारी है। अनुशासन के नाम पर उन पर बहुत दबाव भी डालना ठीक नहीं है, लेकिन, समाज के प्रबुद्ध वर्ग को विद्यालयों में, किसी पर्व पर या अन्य अवसरों पर कार्यशाला आयोजित कर नई उम्र के बच्चों को परिस्थितियों से अवगत कराना चाहिए। उन्हें गलत रास्ता अख्तियार करने से रोकने के लिए समझाया जाए। यह हम सभी की जिम्मेदारी है।
-प्रोफेसर एसपी सिंह, एपीएन पीजी काॅलेज, बस्ती।