भू-गर्भ जलस्तर को रिचार्ज करने के लिए नहीं उठाए जा रहे प्रभावी कदम
शहर के ज्यादातर ताल पोखरो पर कब्जा कर लोगों ने करा लिए पक्के निर्माण
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। जिले में भू-गर्भ जलस्तर हर साल करीब एक फीट गिरता जा रहा है। इससे शहर में पानी की किल्लत होने लगी है। गांधीनगर, रोडवेज, पचपेड़िया, पुरानी बस्ती आदि जगहों पर अब पानी 80-100 फीट पर निकल रहा है। इससे पानी के लिए बोरिंग कराने वालों की लागत बढ़ गई है।
वर्ष 2022 में जिले का भू-जल स्तर 6.02 एमबीजीएल (मीटर बिलो ग्राउंड वाटर लेबल) था, जो अब और नीचे खिसक गया है। इस वर्ष भू-जल स्तर 6.32 एमबीजीएल पर पहुंच गया है। यह प्रतिवर्ष लगभग 30 सेंटीमीटर यानी एक फीट भूजल स्तर में गिरावट दर्ज की जा रही है। हाल ही में पानी के लिए बोरिंग कराने वाले पुरानी बस्ती के मनोज गुप्ता बताते हैं कि 100 फीट तक पानी पीने लायक नहीं निकल रहा है। शुद्ध पेयजल के लिए कम से कम 200 फीट तक बोरिंग करानी पड़ रही है। पहले बोरिंग कराने में चार से पांच हजार रुपये खर्च आता था। अब 35-40 हजार रुपये तक खर्च हो रहे हैं।
भू-गर्भ जल के दोहन का असर अब शहर में दिखने लगा है। यदि भूगर्भ जल को रिचार्ज करने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो वह दिन दूर रही जब शहरवासियों को शुद्ध पेयजल के लिए तरसना पड़ जाएगा। सरकार ने भूगर्भ जलस्तर में सुधार के लिए वाटर हार्वेस्टिंग प्रणाली को लागू करने की नीति बनाया है, लेकिन यह नीति फाइलों में ही दबकर रह गई है। हालात यह है कि सरकारी सिस्टम भी इसके प्रति उदासीन हैं। नियमानुसार, बारिश के पानी को बचाने के लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम सभी सरकारी भवनों में होना चाहिए। ताकि भूगर्भ जल को रिचार्ज किया जा सके। लेकिन, जिलाधिकारी व मंडलायुक्त कार्यालय को छोड़ दिया जाए तो अन्य किसी कार्यालय भवन में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं बन पाया है। ऊपर से शहर में ज्यादातर वेटलैंड (आर्द्रभूमि) पर कब्जा हो चुका है। कभी लबालब पानी से भरे रहने वाले पांडेय पोखरा, लेबुड़वा ताल अब सिर्फ अभिलेखों में ही बचे हैं। ज्यादातर को पाटकर निर्माण करा लिया गया है। ऐसे में जिले का भूगर्भ जलस्तर गिर रहा है।
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बीडीए कार्यालय भी सिस्टम से लैस नहीं
- शहर में निर्माण कार्य कराने के लिए बीडीए से अनुमति लेनी अनिवार्य है। जो ऐसे नहीं करता है उसके खिलाफ बीडीए कार्रवाई शुरु कर देता है। यह चौंकाने वाली बात है कि बीडीए कार्यालय भी रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम से लैस नहीं है। शायद यही वजह है कि व्यवसायिक व अन्य बड़े भवनों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम न होने पर भी बीडीए की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।
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300 वर्गमीटर के मकानों में अनिवार्य
- रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम की बात की जाए तो शहर में इसका चलन ही नहीं दिखता है। चाहे पुराने भवन हों या नए बन रहे हों कहीं भी हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं बना है। डीएम व मंडलायुक्त कार्यालय को छोड़ दिया जाए तो पूरे जिले में अन्यत्र यह सिस्टम देखने को नहीं मिलता है। जबकि नियमानुसार, कम से कम तीन सौ वर्ग मीटर के मकानों में इस सिस्टम का होना अनिवार्य है। वहीं आवासीय के साथ-साथ व्यवसायिक इमारतों में भी वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम होना जरूरी है। यदि बारिश का पानी सहेजा जाता तो जाहिर सी बात है कि जिले का भूगर्भ जलस्तर 1 फिट प्रतिवर्ष की दर से नीचे नहीं गिरता।
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कोट
जिले में भूगर्भ जलस्तर अभी सेफ जोन है। ऐसे में यहां रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को अनिवार्य नहीं किया गया है। यहां लोगों को पानी बचाने के लिए जागरुक करने की जरूरत है। जो समय-समय पर विभाग की ओर से अभियान चलाकर किया जाता है।
शिप्रा चौबे, अभियंता, भूगर्भ जल विभाग।