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Basti News: बैनामा के बाद खारिज-दाखिल आसान नहीं... देना पड़ रहा सुविधा शुल्क

Thu, 11 May 2023 01:12 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
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सदर तहसील में खतौनी लेते किसान
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बस्ती। जमीन बैनामा कराने के बाद खारिज-दाखिल की प्रक्रिया भी टेढ़ी खीर है। नियम में यह जितना आसान लगता है, व्यावहारिक रूप से उतना ही कठिन है। किसी-किसी बैनामे के मामले में साल-दर-साल गुजर जा रहे हैं विक्रेता से क्रेता के नाम जमीन स्थानांतरित नहीं हो पा रही है। अकेले सदर तहसील में ही दाखिल खारिज के करीब दो सौ मामले लंबित हैं। जनपद के अन्य तीन तहसील भानपुर, रुधौली एवं हर्रैया मिलाकर देखा जाए तो इस तरह के हजार से अधिक मामले कानूनी दांव-पेच में उलझे हुए हैं।
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यकीन मानिए जमीन खरीदने भर से आपकी नहीं हो जाएगी। अमूमन लोग क्रेता से रजिस्ट्री करा लेने को ही पूरी प्रक्रिया मानते हैं। लेकिन इसके बाद भूमिका तहसील की होती है। जब तक बैनामे में खरीदी गई जमीन खतौनी में आपके नाम दर्ज न हो तब तक इसे पुख्ता न मानिए। शासनादेश के मुताबिक खारिज-दाखिल बहुत आसान है। बैनामा के 35 दिनों के बाद दाखिल खारिज अपने आप हो जाना चाहिए। लेकिन इसके लिए बिना भागदौड़ और सुविधा शुल्क के कुछ भी होने वाला नहीं है। सामान्य भू-खंड का भी दाखिल खारिज सुविधा शुल्क के बगैर संभव नहीं है। इसके लिए हल्का लेखपाल को खुश करना पड़ता है। तभी क्रेता के पक्ष में उनकी रिपोर्ट अभिलेख पर दर्ज होती है। यदि जमीन कीमती एवं शहरी क्षेत्र की है तो उस पर भू-माफियाओं और तहसील के जिम्मेदारों की मिलीभगत से लंबा खेल होता है। ऐसे भू-खंडों का बैनामा होने के कुछ ही दिनों पर उस पर आपित्त लगा दी जाती है। फिर तो यह लंबे समय के लिए फंस जाता है। विवश होकर क्रेता विभाग एवं आपत्तिकर्ता के मनमुताबिक मोटी रकम गिनते हैं। तब जाकर दाखिल खारिज संभव हो पाता है।

केस नंबर- एक
रौता चौराहा निवासी राजेंद्र कुमार ने तीन माह पूर्व शहर के खीरीघाट में एक रिहायशी घर खरीदा। बैनामा तक सबकुछ ठीक रहा। दाखिल खारिज के लिए जब उनका प्रपत्र तहसील सदर में पहुंचा तो मामला उलझ गया। यह पहले हल्का लेखपाल से मिले। वह टालमटोल करते रहे। बाद में आपत्ति पड़ गई। अब इनका मामला न्यायिक प्रक्रिया में फंस गया है। राजेंद्र ने बताया कि आपत्तिकर्ता के बारे में उन्हें कोई जानकारी ही नहीं है।
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केस नंबर-2
पुरानी बस्ती निवासी यार मोहम्मद के मुताबिक उन्होंने एक साल पहले लोहटी में पत्नी के नाम जमीन खरीदी। इसके कुछ ही दिन के बाद एक अंजान व्यक्ति ने तहसील में आपत्ति लगा दी। इससे उनका खारिज दाखिल रुक गया। जबकि आपत्तिकर्ता का उक्त भू-खंड से कोई लेना देना नहीं था। एक साल पहले हम तहसील का चक्कर कांटे बाद में तहसील के ही जिम्मेदार बिचौलिया बनकर मेरा दाखिल खारिज कराए। इसके बदले हमें 25 हजार रुपये सुविधा शुल्क देना पड़ा।

केस नंबर-3
मड़वानगर निवासी राम सूरत ने 6 माह पूर्व बड़ेवन में जमीन खरीदी। 35 दिनों के इंतजार के बाद उन्हें पता कि दाखिल खारिज में आपत्ति पड़ गई है। बकौल राम सूरत उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा है। मौके पर जमीन का कोई विरोध नहीं है फिर आपित्त कैसे पड़ गई। तहसील के जिम्मेदार मामले के निस्तारण में लंबा खर्चा बता रहे हैं। जिसका इंतजाम नहीं हो पा रहा है।

केस नंबर-4
शहर के विशुनपुरवा मोहल्ला निवासी गिरजेश कसौधन का भी ऐसा ही एक मामला है। वह ओपेक कैली चिकित्सालय के निकट घर बनाने के लिए जमीन खरीदे। लेकिन साल भर बाद भी उनका दाखिल खारिज नहीं हो पाया है। आपत्ति का बहाना बनाकर जिम्मेदार उनके काम में अड़ंगा बने हैं।
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यह है खारिज-दाखिल की प्रकिया
जमीन का बैनामा कराने के बाद अंतिम प्रक्रिया दाखिल खारिज की होती है। यह तहसील से पूरी होती है। निबंधन कार्यालय से बैनामा का ब्योरा प्रतिदिन संबंधित तहसील में भेजा जाता है। यहां से प्रति बैनामा क्रेता-विक्रेता को समन जारी कर 35 दिनों तक इंतजार किया जाता है। आपत्ति न आने की दशा में मजिस्ट्रेट स्तर से संबंधित भू-खंड के अमल दरामद का आदेश निर्गत कर दिया जाता है। इसके बाद खतौनी से विक्रेता का नाम खारिज कर क्रेता का नाम दर्ज हो जाता है।

आपत्तियों पर सुनवाई में हीलाहवाली
दाखिल खारिज में आने वाली आपत्तियों की सुनवाई में हीलाहवाली खूब की जाती है। नियमावली के मुताबिक दाखिल खारिज में आपत्ति कोई भी कर सकता है। लेकिन संबंधित अधिकारी यदि आपत्ति पर त्वरित सुनवाई करें तो काफी हद तक ऐसे मामले निस्तारित होते जाएंगे। जानबूझकर इन्हें लंबित रखा जाता है।

निर्धारित समय पूरा होने के बाद बैनामा जमीन के दाखिल खारिज के निर्देश दिए गए हैं। जहां तक आपत्तियों का मामला है तो इसकी सुनवाई मजिस्ट्रेट के स्तर से की जाती है। न्यायिक प्रक्रिया में दोनों पक्षों को दलील रखने का पूरा मौका दिया जाता है। इसलिए विलंब होना स्वाभाविक है। -शैलेश दुबे, उपजिलाधिकारी, बस्ती सदर।
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