मुंडेरवा। क्षेत्र के दीक्षापार में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा में तीसरे दिन राजा प्रियव्रत की कथा सुनाते हुए महामृत्युंजय पीठाधीश्वर स्वामी प्रणव पुरी महाराज ने कहा कि मनुष्य को संसार में रहकर विकारों को त्यागने का प्रयास करना चाहिए। सब कुछ होते हुए भी अनाशक्त का भाव रखना चाहिए। तभी संसार से मुक्त हो पाओगे।
कहा कि संसार पागल को पागल समझता है, और पागल सारे संसार को पागल समझता है। असली पागल कौन है यह सोचनीय है। जड़ भरत ने संसार के किसी भी गुण को नहीं अपनाया अर्थात यह संसार आपसे नहीं आपके गुणों से प्रेम करता है। जिस समय आपके द्वारा कुछ प्राप्त होना बंद हो जाएगा, आपके अपने भी व्यवहार बदल लेंगे। यही स्वार्थी संसार का सत्य है।
अजामिल जीवन भर पाप करता रहा किंतु अंत समय में प्रभु का स्मरण करने से यम यातना से बच गया। जो प्रभु एक क्षण में कृपा कर सकते हैं, उनका प्रतिक्षण स्मरण करते रहना चाहिए। कलियुग में तो नाम की ही महिमा है। मौके पर मुख्य यजमान कैप्टन रमाकांत शुक्ल, चंद्रावती, शशिकांत शुक्ल, अमित शुक्ल, लक्ष्मीकांत शुक्ल, राम अवध पांडेय, रामचंद्र शुक्ल, चिंता हरण शुक्ल आदि मौजूद रहे।