बस्ती। भगवान श्रीकृष्ण की अंगुली में द्रोपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू बांध दिया था। इसका कर्ज प्रभु ने तो चुका दिया। इसके अलावा बहनों के लिए भाइयों की कुर्बानी के तमाम उदाहरण हैं, मगर अपने शहर में पांच बहनों ने इकलौते भाई को यमराज से छीन नई जिंदगी दी है। एक बहन ने किडनी दी, तो चार अन्य बहनों ने दवा का खर्च उठाया। भाई, ऐसी बहनों को पाकर निहाल है। कहते हैं कि ''मेरी एक नहीं बल्कि पांच मां और हैं।''
बस्ती शहर के जयपुरवा मुहल्ले के रहने वाले संतोष सिंह (45) के पिता स्व. रामबचन सिंह पीडब्ल्यूडी में इंजीनियर थे। तो माता मानता गृहणी हैं। पांच बहनों में इकलौते भाई संतोष पांच साल की उम्र में गंभीर रूप से बीमार पड़े तो गोरखपुर में इलाज के दौरान डॉ. वाईडी सिंह ने दोनों किडनी में दिक्कत होने की जानकारी दी। इसके बाद इनका इलाज पीजीआई चंडीगढ़ में होता रहा। 1999 में दवा रीएक्शन के कारण इनकी दोनों किडनी खराब हो गई। परिवार के लोग लखनऊ पहुंचे, जहां पीजीआई में इनकी डायलेसिस शुरू हो गई। बेटे को बचाने के लिए किडनी की जरूरत थी, जिसके लिए मां तैयार हुईं। इसके बाद जांच पड़ताल हुई तो पता चला कि किडनी 60 फीसदी ही सही है, फिलहाल मां की किडनी बेटे को लगा दी गई। यहां से लौटने के बाद संतोष के जीवन का संघर्ष शुरू हुआ। सबसे पहले पिता ने साथ छोड़ दिया। पिता की मौत से संतोष को अपना भविष्य अंधकारमय नजर आने लगा। शुरू के दिनों में लोग मिलने जुलने आते रहे, लेकिन आर्थिक तंगी के चलते लोग संतोष व उनके परिवार से कटने लगे।
इस बीच संतोष ने एक स्कूल खोल अपने जीवन की नैया इसके सहारे पार लगाने की सोची। यह सोच उन्हें आगे लेकर चली कि इसी बीच 2004 में मां की ओर से दी गई किडनी ने धोखा दे दिया और संतोष फिर गंभीर रूप से बीमार हो गए। माता इन्हें लेकर दिल्ली गईं, जहां जांच के बाद चिकित्सक ने किडनी खराब होने की बात बताई।
इकलौते छोटे भाई को दिल्ली में एक अस्पताल में देखने पहुंचीं बहनों ने भाई बनने की ठान ली। देवरिया में ब्याही बहन रम्मा सिंह ने अपनी एक किडनी देने का, तो देवरिया की ही रहने वाली बहन अन्या शाही, लखनऊ की मनीषा सिंह, कुसुम सिंह और अंशु सिंह ने ऑपरेशन के साथ ही दवा का खर्च उठाने का फैसला किया। ऑपरेशन सफल रहा। करीब दो तीन माह इलाज के बाद संतोष सिंह फिर से नई जिंदगी लेकर वापस अपने घर बस्ती लौटे। तब से लेकर अब तक का करीब 18 साल का लंबा समय बीत गया है, और आज एक स्कूल के संचालक संतोष स्वस्थ जीवन जी रहे हैं।
वर्ष 2007 में विजयलक्ष्मी के रूप में उन्हें ऐसी जीवनसंगिनी मिली, जिसने उनकी बीमारी के बारे में पूरी जानकारी होने के बावजूद वरमाला डाली। दो बच्चों शिवोहम और राजश्री के साथ दोनों खुश हैं। संतोष कहते हैं कि मां सरीखी बहने पाने वालाें में दुनिया का सबसे भाग्यशाली भाई हूं। शायद ही किसी जन्म में बहनों के राखी का कर्ज उतार सकूं।